ओ! मई 2019, नफरत की हवा बदल दो
मुझे 2019 मई का इंतजार है. लोकसभा चुनाव से बहुत उम्मीदें हैं. हां, राजनीतिक उम्मीदें ही हैं क्योंकि शायद पहली बार राजनीति ने घर-परिवार के भीतर दीवार खड़ी कर दी है. निजी जीवन प्रभावित हो चुका है. ऐसा नहीं है कि मुझे कांग्रेस या किसी विपक्ष से बहुत ज्यादा उम्मीदें हैं. बतौर पत्रकार जिम्मेदारी सत्ता से सवाल करने की है. वह बताने की है जो वे छिपाना चाहते हैं. पर आज मैं क्या हम सब एक ऐसे मुहाने पर खड़े हैं जहां हमारे रिश्ते नफरत की राजनीति से प्रभावित हैं. चाहकर भी मैं उसे अनदेखा नहीं कर पाता. परिवारों और रिश्तों के बीच राजनीति ने नफरत बो दी गई है. ये भाजपा-संघ की फेक/फॉल्स न्यूज़ पर सवार आक्रमक राजनीति का नतीजा है. मैं उसका पीड़ित हूं. मैं अपनी नानी वापस चाहता हूँ. मामा वापस चाहता हूं. चचेरे/मौसेरे भाई वापस चाहता हूं. चूंकि मैं सवाल करता हूं, वो मुझे कम्युनिस्ट समझते हैं. उनके लिए कम्युनिस्ट होने का मतलब देशद्रोही होना होता है. कभी वे मुझे मैं प्रो-कांग्रेस, कभी प्रो-केजरी कहते हैं. वे मुझे हर उस खांचे में डालते हैं, जो भाजपा और संघ के एजेंडे के खिलाफ है. 2013-14 के साल...