सांप्रदायिक बुनियाद के बीच तर्क इस्लाम का अभ्यास
-इश्तेय़ाक अहमद उस वक़्त मेरी उम्र कुछ 8-9 बरस रही होगी। बचपन ढेरों बच्चों की सोहबत में गुज़र रहा था। कुछ ख़ानदान के थे, कुछ पासपड़ोस के। एक तरफ़ काफ़ी तवील ख़ानदान और दूसरी तरफ़ माँ-बाप के साथियों-दोस्तों के गहवारे। माली तंगी के बावजूद ख़ुद को कभी बेचारा या कमज़ोर महसूस नहीं किया, शायद लड़का होने की वजह से। ख़ैर, उस दिन हमसब, कुछ 7-8 बच्चे कुएँ के पास के करौंदे की घनी झाड़ के पास बने हौज़ की दीवार पर बैठे गपिया रहे थे। धूप काफ़ी तेज़ थी, पर तब गर्मी कहाँ महसूस होती थी। गुलाबी-सफ़ेद खट्टे करौंदों की आख़िरी खेप भी ख़त्म हो चुकी थी। बस इक्के-दुक्के वही फल बचे थे जो कंटीली झाड़ी के बिल्कुल अंदर में थे और कोई भी उनतक पहुँचने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। लाल चींटियों की एक लंबी क़तार हौज़ के एक कोने में चढ़ उतर रही थी। "लाल चींटी हिन्दू होती है" - हमसे कोई दो बरस छोटे एक लड़के ने कहा। लगभग उसी उम्र की एक लड़की ने जोड़ा - "लाल चींटी ज़ोर से काटती है। काली चींटी मुसलमान होती है, कभी काटती नहीं।" मेरे घर पर रिश्तेदारों के अलावा आनेवाले लगभग सभी लोग हिन्दू होते ...