कुराइच से जुड़ा बालमन
केतारी (ईंख — वैसे हमारे यहाँ ऊंख कहते हैं), ठेकुँआ, घाट, नए कपड़े, रात को लूडो खेल-खेलकर जागना, घाट पर पटाखें फोड़ना, नानी का दुलार वैगेरह वैगेरह. बालमन छठ को भी कई तरीकों से याद रखता है। लोकपर्व में अपने हिस्से की आस्था तलाशता है. आज भी याद आता है स्कूल से हॉफ डे लेकर पापा के साथ गया-डेहरी पैसेंजर से सासाराम पहुँचता था, खरना के दिन. माँ चित्रगुप्त पूजा के अगले दिन ही छठ के लिए नानीघर चली जाया करती. माँ और नानी छठ करतीं थीं. माँ चेहरा देख लेती तो उसे लगता जैसे उसके छठ का प्रायोजन पूरा हो गया. खरना का प्रसाद खाते, नानी अपने नाती को दो केला एक्सट्रा ज़्यादा देती, नानी और माँ दोनों के पैर दबाते, पैर दबाते हुए अच्छे से पढ़ने की नसीहतें दी जातीं हमें. अगले दिन के उत्साह का कारण होता नहर पर जाना. बच्चे दोपहर के खाने के बाद से ही पूछने लग जाते कि पापा कितने बजे चलेंगे नदी पर, बहुत देर हो रहा है — हमारे लिए मेला हुआ करता. हमारा नहर कुराइच था. किस नदी से काटकर वह नहर बना था, इसकी न मुझे आज जानकारी हुई, न जानने की कभी कोशिश की.. क्रीज वाले कपड़े एकदम जा-झाड़ के टाइप पहनकर, बाल संवारकर तैयार...