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पत्रकारिता में दाखिल होने के पहले आपके नाम एक कन्फेसन :- पहली क्लास के ठीक पहले

मैं कभी मीडिया का छात्र बनूँगा, सोचा भी नहीं था. वैसे, ये भी कहाँ सोचा था कि राजनीति विञान पढूँगा. सच तो है कि मैं कभी पढ़ूँगा और अच्छा करूँगा ये तो पढ़ाने वाले क्या साथ वालों ने भी नहीं सोचा था. खैर, जब कल से आईआईएमसी के वातानुकुलित कमरों में औपचारिक तौर पर पत्रकारिता की बदनाम बस्ती में एक छात्र के तौर पर क,ख,ग..की शुरूआत होगी..मन उत्साहित है लेकिन अंतर्तद्वंदों से भी घिरा हूँ. जिस माहौल में पत्रकारिता में कूद रहा हूँ वहाँ व्याप्त अनिश्चितताएं, डर, चिंताएं शामिल हैं. लेकिन ये कहाँ नही है! फर्क़ है किसी पेशे का समाज में गाली बन जाना. उसके खिलाफ़ आक्रमकता का माहौल जहाँ पेशा अपने मूल विचार से जुदा होने लगे. खुद उसका उग्र हो जाना, सूचना पहुँचाने वाले से न्यायाधीश में तबदील होते जाना, बिरादरी के भीतर ही एक दूसरे के विरोध में खड़े हो जाना, दर्शकों-पाठकों को खाँचे में बाँट देना... वैसे, आप पत्रकारों का कितना सम्मान करतें हैं ये किससे छिपा है. पत्रकार खुद अपने पेशे के साथ न्याय भी तो नहीं कर पाते. ऐसे में मैं क्या नया या कितना न्याय कर पाऊँगा ये दिलचस्प तो है ही, चुनौतीपूर्ण भ...