पत्रकारिता में दाखिल होने के पहले आपके नाम एक कन्फेसन :- पहली क्लास के ठीक पहले


मैं कभी मीडिया का छात्र बनूँगा, सोचा भी नहीं था. वैसे, ये भी कहाँ सोचा था कि राजनीति विञान पढूँगा. सच तो है कि मैं कभी पढ़ूँगा और अच्छा करूँगा ये तो पढ़ाने वाले क्या साथ वालों ने भी नहीं सोचा था. खैर,

जब कल से आईआईएमसी के वातानुकुलित कमरों में औपचारिक तौर पर पत्रकारिता की बदनाम बस्ती में एक छात्र के तौर पर क,ख,ग..की शुरूआत होगी..मन उत्साहित है लेकिन अंतर्तद्वंदों से भी घिरा हूँ. जिस माहौल में पत्रकारिता में कूद रहा हूँ वहाँ व्याप्त अनिश्चितताएं, डर, चिंताएं शामिल हैं. लेकिन ये कहाँ नही है!

फर्क़ है किसी पेशे का समाज में गाली बन जाना. उसके खिलाफ़ आक्रमकता का माहौल जहाँ पेशा अपने मूल विचार से जुदा होने लगे. खुद उसका उग्र हो जाना, सूचना पहुँचाने वाले से न्यायाधीश में तबदील होते जाना, बिरादरी के भीतर ही एक दूसरे के विरोध में खड़े हो जाना, दर्शकों-पाठकों को खाँचे में बाँट देना...

वैसे, आप पत्रकारों का कितना सम्मान करतें हैं ये किससे छिपा है. पत्रकार खुद अपने पेशे के साथ न्याय भी तो नहीं कर पाते. ऐसे में मैं क्या नया या कितना न्याय कर पाऊँगा ये दिलचस्प तो है ही, चुनौतीपूर्ण भी.

फेसबुक, ब्लॉगर में लिखे ब्लॉग पर आपकी सहमतियाँ-असहमतियाँ रही हैं लेकिन वो काफी हद तक दोस्ताना या सीखने-सिखाने के स्तर पर रहीं हैं. कम से कम कल से नहीं, कुछ वर्षों बाद कहीं असहमतियों को लेकर आप असहज तो नहीं हो जाएंगें? सुविधानुसार फ्रेम तो नहीं करेंगें? ट्रॉल तो नहीं करेंगें? मुझसे संवाद तो खत्म नहीं कर देंगें? जिस सिखने-सिखाने की प्रवृति का विस्तार हमने सोशल मीडिया पर किया कहीं वो ठहर तो नहीं जाएगा?

आपको भी मुझसे सवाल करना चाहिए-"हम तो असहज नहीं होंगे, संवाद खत्म भी नहीं करेंगे पर, कहीं तुम अपनी आव़ाज ही नेशन की आवाज तो नहीं बनाने लगोगे? ताल ठोंक के डीएनए टेस्ट तो नहीं करोगे? हमारी चिंताओं का निवारण न सही, मुखर होकर उठाओगे तो सही? तुम विचारों से असहमति के बावजूद सत्यता दिखाओगे-बताओगे तो सही? सपाट शब्दों में- सत्यता-त्थयात्मकता के साथ घालमेल तो नहीं करोगे?"

मैं तनीक भी इस गुमान में नहीं जीना चाहता कि मैं आईआईएमसी वाला हूँ, समाज-दुनिया बदल दूँगा. हाँ, कोशिश जरूर की जा सकती है लेकिन उसके पहले ईमानदारी से आपसे कुछ कन्फेस करना जरूरी है...

आपके उम्मीदों का पत्रकार बनने के लिए और खुद के पेशे से न्याय कर पाना, साफ शब्दों में मौजूदा मीडिया इंडस्ट्री इस काबिल नहीं है. आगे स्थितियाँ सुधर जाएंगी या नहीं या और बिगड़ती चली जाएंगी इसका पूर्वानुमान कम से कम मैं नहीं कर सकता. मेरे लिए हमेशा ज़मीर या कह ले जो किसी भी स्थिति में शक्ति की संरचना से दूर है, उसकी अभिव्यक्ति ही पत्रकारिता की मूल समझ रही है. आगे भी इन्हीं पैमानों पर बढ़ता रहना चाहता हूँ. लेकिन मान लिजीए, मीडिया का ढ़ांचा मुझे यह करने से दूर करता है तो क्या आप हमारी  जिम्मेदारी लेंगे? क्या हमारे परिवार और निजी जरूरतों की भरपाई कर देंगे? या आप मुझमें एक ऐसा योद्धा देख रहे हैं जिसे सिर्फ़ धर्म-कर्म की आड़ में बाकी रिश्तों और जिम्मेदारियों की चिंता से मुक्त हो जाना चाहिए?

माफ कीजिएगा, मैं ऐसा योद्धा तभी बनने को तैयार हूँ जब किसी पत्रकार की हत्या को शहीद का दर्जा मिल जाए. सेना को लेकर जीतनी दिवानगी है, उसी तरह की दिवानगी पत्रकारों, मीडियाकर्मियों के लिए हो जाए..आप सिर्फ़ इस तरफ को कोसे और खुद को एक संजीदा पाठक-दर्शक के तौर पर न बदल पाएं तो दोष का भार बाँट लिया जाना ही उचित होगा.

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