सांप्रदायिक बुनियाद के बीच तर्क इस्लाम का अभ्यास

 -इश्तेय़ाक अहमद
उस वक़्त मेरी उम्र कुछ 8-9 बरस रही होगी। बचपन ढेरों बच्चों की सोहबत में गुज़र रहा था। कुछ ख़ानदान के थे, कुछ पासपड़ोस के। एक तरफ़ काफ़ी तवील ख़ानदान और दूसरी तरफ़ माँ-बाप के साथियों-दोस्तों के गहवारे। माली तंगी के बावजूद ख़ुद को कभी बेचारा या कमज़ोर महसूस नहीं किया, शायद लड़का होने की वजह से।  
ख़ैर, उस दिन हमसब, कुछ 7-8 बच्चे कुएँ के पास के करौंदे की घनी झाड़ के पास बने हौज़ की दीवार पर बैठे गपिया रहे थे। धूप काफ़ी तेज़ थी, पर तब गर्मी कहाँ महसूस होती थी। गुलाबी-सफ़ेद खट्टे करौंदों की आख़िरी खेप भी ख़त्म हो चुकी थी। बस इक्के-दुक्के वही फल बचे थे जो कंटीली झाड़ी के बिल्कुल अंदर में थे और कोई भी उनतक पहुँचने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। लाल चींटियों की एक लंबी क़तार हौज़ के एक कोने में चढ़ उतर रही थी।  
"लाल चींटी हिन्दू होती है" - हमसे कोई दो बरस छोटे एक लड़के ने कहा। लगभग उसी उम्र की एक लड़की ने जोड़ा - "लाल चींटी ज़ोर से काटती है। काली चींटी मुसलमान होती है, कभी काटती नहीं।"  
मेरे घर पर रिश्तेदारों के अलावा आनेवाले लगभग सभी लोग हिन्दू होते थे और वे सभी बड़े अच्छे लगते थे। हमेशा जोश से भरे, दुनिया बदलने की उनकी ललक और आंखों की चमक से पूरा घर जगमग रहता। ईद-बक़रीद, होली-दिवाली हमेशा हमारे घर में भीड़भाड़, बहस- मुबाहिसे, हँसी-ठट्ठे की गूँज होती। मेरी समझ में यह बात बिल्कुल भी न आई कि ज़ोर से काटने वाली चींटियाँ हिन्दू कैसे हो सकती हैं? फिर कीड़े मकोड़े, गधे बंदर कैसे हिन्दू या मुसलमान हो सकते हैं?
तीसरे बच्चे की बात ने हमको पूरी तरह झकझोर दिया। वोह कह रहा था - "सभी मुसलमान जन्नत में जाएंगे और सभी हिन्दू जहन्नुम में।"
"लेकिन अम्मी तो कहती हैं कि अच्छा काम करने वाले जन्नत में जाएंगे और दूसरों को परेशान और चोरी-बेईमानी करने वाले जहन्नुम." 
"लेकिन कोई हिन्दू कितना भी अच्छा काम करे जन्नत नहीं जा सकता" - हमसब में सबसे बड़ी लड़की ने फ़ैसला सुनाते हुए कहा। 
"तो क्या नाना-नानी भी जहन्नुम जाएंगे?" मेरी नानी की कोई याद मेरे ज़हन में बाक़ी नहीं थी, उनकी मौत तब हो गई थी जब हम 2 बरस के भी नहीं हुए थे। नाना अब्बा तब बाहयात थे और हमेशा अपने पढ़ाई-लिखाई के कामों में मसरूफ़ रहते। कभी किसी को डांटते-डपटते नहीं पर बच्चों से ज़्यादा हिलते-मिलते नहीं थे। और दूसरी तरफ़ नाना-नानी थे जो हमपर जान छिड़कते थे। नाना यानी कॉमरेड डॉ ए के सेन और नानी, उनकी प्यारी सी शरीकेहयात, शेफ़ाली सेन। डॉ सेन पटना के उन चंद डॉक्टरों में से थे जिनकी फ़ीस बहुत कम थी। कम हैसियत वालों से वे फ़ीस नहीं लेते और अपने पास से सैंपल वाली दवाएँ दे दिया करते थे। बेहद कम दवाएँ लिखते और मानो उनके हाथों में ही शिफ़ा थी कि मरीज़ चंगे हो जाते। सबसे बेहद ख़ुलूस और शफ़क़त से बात करते। हमने ख़ुदा को न देखा, उनको देखा। 
नानी का प्यार इतना पाक था कि घंटों उनके पास बैठे रहिए कभी मन न भरता। अपनी गोद में बिठाकर खिलातीं। उनके हाथों में मानो दुनिया भर का ज़ायक़ा था। एक एक निवाला मनोसलवा से भी ऊम्दा। सर पर हाथ धर देतीं तो आँखें आप ही आप बंद हो जातीं। ऐसा महसूस होता जैसे अहले सुबह सैंकड़ों घंटियों के साथ पुरसुकून अज़ान की आवाज़ घुलमिल गई हो।
"तो क्या नाना-नानी भी जहन्नुम में जाएंगे?"
"और नहीं तो क्या! हिन्दू हैं तो जहन्नुम ही जाएंगे।" 
"झूठ बात है, अच्छे लोग जहन्नुम नहीं जाएंगे।" 
"हिन्दू अच्छा हो या बुरा जहन्नुम जाएगा।" 
"और मुसलमान बुरा काम करे तो...?" 
"फिर भी वो जन्नत में जाएगा।" 
"तुमलोग बुद्धू हो। तुमको कुछ नहीं आता। अल्ला मियां बेवक़ूफ़ थोड़ी हैं। वो सब देखते हैं, सब जानते हैं। वो ऐसी ग़लती कैसे कर सकते हैं?" 
"पर क़ुरान शरीफ़ में यही लिखा है।" 
"बुद्धू हो तुम। क़ुरान शरीफ़ बहुत अच्छी किताब है, उसमें ऐसी फ़ालतू बात नहीं लिखी हो सकती।" 
बहस जारी थी कि किसी ने तजवीज़ दी कि किसी बड़े से पूछ लिया जाए। यह तय हुआ कि सबसे ज़्यादा रोज़ा-नमाज़ करने वाली एक पड़ोसी से पूछा जाएगा और वो जो कहेंगी वही सच माना जाएगा। वो मोहतरमा उन्हीं बच्चों में से एक की दादी थीं। बड़ी परहेज़गार, सभी बच्चों से प्यार करने वाली। पर क़तई सख़्त। उनके शौहर काफ़ी कम उम्र में मफ़लूज हो गए थे पर उन्होंने न सिर्फ़ अपने परिवार को संभाल लिया बल्कि ख़ानदान के कई बच्चों को भी अपने साथ रखकर उनकी परवरिश कर रही थीं। 
"क्या नाना-नानी भी जहन्नुम जाएंगे?"  
"हर काफ़िर की जगह जहन्नुम में है।" 'काफ़िर'! यह लफ़्ज़ नया नहीं था पर मेरे लिए इसका मतलब 'बुरे लोग' था।  
"पर नाना-नानी तो काफ़िर नहीं हैं!" 
"सही कह रहे हो। किसी भी ज़िंदा इंसान को काफ़िर कहना गुनाह है। लेकिन मरने तक अगर वो लोग इस्लाम क़बूल नहीं करते तो काफ़िर रहेंगे। फिर तो उन्हें जहन्नुम में ही डाला जाएगा।" 
"चाहे वोह लोग कितने भी अच्छे काम करें, कितने भी अच्छे हों?" 
"अगर वो कलमा पढ़कर मुसलमान नहीं हो जाते, काफ़िर ही रहेंगे और जहन्नुम ही उनकी जगह है।"

यह मेरी हार थी, मेरे इस्लाम की हार थी। अम्मी के बताए दीन की हार थी। जीते हुए इस्लाम को तबीयत क़बूल न कर पाई, बल्कि बाल मन ने बग़ावत का रस्ता अपनाया। हालाँकि उसके फ़ौरन बाद नमाज़ पढ़ने या रोज़े रखने जैसे रिवायात तर्क नहीं किए पर दिल से वोह दीन उतर गया था जो अच्छे-बुरों में तमीज़ न कर पाता हो और झूठे-सच्चे अल्फ़ाज़ की क़ैद में गिरफ़्त हो। वोह अल्लाह भी नाकारा मालूम होता जो चापलूसी का मुहताज है। जो एक ख़ास ज़ुबान में ही बातें समझ सकता था वोह पूरी दुनिया का ख़ालिक़, मालिक कैसे हो सकता है?


वोह वक़्त था और अब का वक़्त है कि मज़हबों की गिरफ़्त टूट गई है। मीर के साथ कश्का खैंच, दैर में बैठ तर्क ए इस्लाम कर दिया।
बाद में दूसरे मज़ाहिब भी उतने ही ख़ाली डिब्बे दिखे जिनमें लोग पत्थर भर ज़ोर-ज़ोर से शोर मचाया करते हैं। अब लगता है हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद जो नहीं जानते वफ़ा क्या है।


(यह कहानी इश्तेय़ाक अहमद के फेसबुक वॉल से साभार ली गई है. लेखक को फेसबुक पर यहां फॉलो कर सकते हैं.)

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