इलेक्ट्रॉनिक व्यवहारिकता
इलेक्ट्रॉनिक व्यवाहारिकता
-रोहिण कुमार
आज जमाना सोशल मिडीया का है। सोशल का अर्थ होता है सामाजिक तो मतलब इसे हम सामाजिक सार्वाजनिक मंच कह सकते हैं। उदाहरण के तौर पर फेसबुक,वाट्सअप, ट्विटर, हाइक, मैसेंजर, यूट्यूब, टेलिग्राम, इंस्टाग्राम, गूगल प्लस, लाइन, लिंक्डइन, वी चैट आदी। विगत एक वर्ष से मैं भी फेसबुक, वॉट्सअप और थोडा-बहुत ट्विटर का इस्तेमाल कर रहा हूं और इसका अनुभव बेहद रोचक रहा है। वैसे ये हैं तो सोशल मिडीया पर अब यह एक नए सामाज की स्थापना की ओर बढ चलें है। यह सामाजिकता और व्यवहारिकता को नए सिरे से परिभाषित करने को आतुर हैं।
सोशल मिडीया के माध्यम से पूरी दुनिया तकनीक के माध्यम से जुडी है। कई बातें आप अपने सोशल लाइफ में बताने या करने से हिचकेंगे पर शायद सोशल मिडीया पर इसकी गुंजाइश भी महसूस नहीं होगी। यह नई दुनिया की व्यवहारिकता है जो चेहरे के सामने और पीछे अपनी रंगत बदलती है।
इस बदलते व्यवहार या कहें नई व्यवहारिक शैली के कई उदाहरण हर रोज मिलते हैं। मैं भी कोई अपवाद नही। तो, क्या 'ब्लू टिक' के बाद भी जबाव न मिलने से आप खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं? ये तो वाट्सअपिया विधा है। कुछ इसे उपेक्षा समझेगें तो कुछ इसे व्यस्तता कहेंगे। अच्छा,'स्टेटस उपडेट' तो पक्का करते हैं, हैं न!! जी,चंद पंक्तियों से अपने 'ओहदे' की वर्तमान स्थिती से दुनिया को वाकिफ कराते रहना भी एक 'इ-कला' हैं। फेसबुक का 'प्रोफाइल फोटो' वाट्सअप में 'डीपी' बन जाता है। दोनों का मतलब एक ही है पर अलग प्लेटफार्म हैं तो नाम अलग है। सहमित्रता आसान हुई है। पहले लडकियों से संपर्क नंबर लेना मुश्किल था,वाट्सअप ने इसका भी सरलीकरण कर दिया पर सोशल मिडीया 'इ-छेडखानी' रोकने में नाकाम रहा जैसे फिजूल संदेश,असली नाम से नकली आईडी, तस्वीरों या विडीयो की इडिटिंग कर सोशल मिडीया पर बदनाम करने की कोशिश आदी।
'फ्रेंड रिक्वेस्ट' तो समझते ही होंगें। फेसबुक पर मां,पिता,भाई,बहन को छोड सारे रिश्ते दोस्ती के धागे में पिरोए हैं। 'फ्रेंड रिक्वेस्ट' से बनते हैं नए मित्र,यूं कहें तो 'इ-मित्र'। इ-मित्रों की व्यवाहारिकता गजब की है। एक दिन किसी मित्र ने स्टेटस उपडेट में लिखा-"अकेला महसूस कर रही हूं।' इ-मित्रों ने 'लाइक' कर अपना साथ जताया। किसी ने कोई तस्वीर साझा की,उसपर भी लाइक,मतलब उन्हें तस्वीर अच्छी लगी। कुछ दिनों पहले मेरे मित्र ने अपने पिताजी के देहांत की खबर साझा की,उसपर भी लाइक। यहाँ लाइक का मतलब संवेदना प्रकट करना। दरअसल, 'लाइक' का शाब्दिक अर्थ होता पसंद करना। पर यह इ-व्यवहारिकता की देन है कि तीनों 'लाइकों' का अर्थ बदल जाता है।
हद तो तब हो जाती है,जब धार्मिक आस्था के लिए 'लाइक्स' मांगे जाते हैं। हनुमान के विशाल प्रतिमा की तस्वीर के साथ लिखा है-"सनी लियोनी के तस्वीर पर तो लाखों लाइक,देखें इस संकटमोचक के तस्वीर को कितने लाइक मिलते हैं।" और इस भावनात्मक अपील से हनुमान लियोनी से रेस में मिलों आगे निकल जाते हैं,उनके तस्वीर पर दसों लाखों 'लाइक' मिलते हैं। ऐसे ही कुछ अपील हर धर्म की आस्था के साथ होता है।
तथाकथित राष्ट्रीय मिडीया की भी एक अलग तस्वीर दिखती है सोशल मिडीया पर। खासकर,इलेक्ट्रॉनिक मिडीया के फेसबुक पेजों पर आपको ढेर सारी मसाला खबरें मिलेंगी जो समाचार के साथ अंतरंग पलों को और भी रूहानी कैसे बनाएं,ये भी बताते हैं। ये बिल्कुल सही है कि सोशल मिडीया के वजह से हम अपनों से दूर होकर भी पास हैं पर कहीं न कहीं हमारी व्यवहारिकता बदल रही है। हम सामने किसी की बात को सुनकर अनसुना शायद नहीं करते पर इन माध्यमों पर करते हैं। सोशल मिडीया पर बोलना मतलब लिखना और सुनना मतलब पढना होता है। आजकल, बहुत खास होने पर ही खुशी या गम का इजहार फोन करके करते हैं,बाकी तो 'स्माइली' के जरिए 'इ-भावनाओं' का आदान प्रदान से ही हो जाता है।
महत्वपूर्ण और गौर करने की बात है कि सोशल मिडीया हमारी भावनाओं का बाजारीकरण कर रहा है। भावनात्मक अपील से 'लाइक' करा पैसे बना रहा है। हमारी सामाजिक व्यवहारिकता को नियंत्रित कर रहा है। शहर ही नहीं गांवों में भी 'स्मार्टफोनिया' बनने की ललक है। पहले छोटे साधारण फोन से स्मार्टफोन पर ढकेला गया और अब इंटरनेट उस स्मार्टफोन की जरुरत बना दी गई। बिना इंटरनेट के स्मार्टफोन 'स्मार्ट' नहीं है।
चर्चा यहाँ अच्छे-बुरे या सही-गलत की नहीं है,जरुरत है आत्मवलोकन करने की। सोशल मिडीया के 'सोशल' शब्द पर चिंतन कर इसकी सदुपयोगिता बढाने की। कहीं ऐसा न हो कि इ-गवर्नेंस वाले जमाने में हमारी व्यवहारिकता भी 'इ' हो जाए।
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