कोरोनावायरस का मीडिल क्लास हॉटस्पॉट
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| साभार: इंडिया टुडे |
तकरीबन पांच रोज़ पहले मैंने फेसबुक पर लोगों से ये पूछा था. कुछ एक लोगों ने मुझे इंबॉक्स में बताया कि वे डरे हुए हैं. उनके यहां ये चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं. 12 और 13 तारीख से जो खबरें मिलनी शुरू हुईं, उससे ये स्पष्ट हो गया कि कोरोनावायरस ने मध्य वर्गीय सामुदायिक संक्रमण की बिगुल फूंक दी है. क्विंट ने 45 लोगों को “Leave without pay” पर भेज दिया. क्विंट ने ऑटो और टेक सेक्शन भी बंद कर दिया है. उड़ती-उड़ती खबर है कि एनडीटीवी में ऊपर से नीचे सबकी 30% सैलरी कट की जा सकती है. फिलहाल कंपनी की तरफ से कोई आधिकार मेल नहीं आया है. इसके एक रात पहले मुझे एक लड़के ने बताया कि न्यूज़ नेशन ने पूरी इंग्लिश टीम को तत्काल प्रभाव से टर्मिनेट कर दिया है. गांव कनेक्शन ने रिपोर्टरों को सैलरी कट संबंधी ईमेल भेजा है. वायर और न्यूज़लॉन्ड्री खस्ताहाल हैं. इंडियन एक्सप्रेस और बिजनेस स्टैंडर्ड प्रिंट में भी सैलरी कट होना है. सामाचार एजेंसी पीटीआई ने साथियों को उनके वेतन का सिर्फ 60% दिया है. खबर ये भी है कि बहुत सारे न्यूज़ संस्थानों ने एजेंसी का सब्सक्रिप्शन बंद कर दिया है. आउटलुक मैगजिन, टाइम्स ऑफ इंडिया ने संडे मैगजिन, नई दुनिया (उर्दू) और स्टार मैसूर (सांध्य अखबार) का प्रिंट संस्करण बंद हो रहा है. अमर उजाला में 50% सैलरी कट हो चुकी है. सीएनबीसी आवाज़ की स्थिति डंवाडोल बताई जा रही है. द हिंदू में नौकरियां अब-तब में हैं.
चूंकि मेरे आसपास न्यूज़ प्रोफेशनल्स ज्यादा है तो मुझे उस स्पेस की ज्यादा जानकारी है. इसमें भी हमें यह नहीं मालूम कि अखबारों के राज्यवार संस्करणों से जुड़े लोगों की क्या हालत है. स्ट्रिंगरों की क्या दुर्दशा हो चुकी होगी. साथ ही मेरी दिलचस्पी यह भी जानने में है कि क्या भाजपा के आईटी सेल तक ये छंटनी का दौर पहुंचेगा? वहां भी कुछ कॉस्ट कटिंग होगी? क्या उनके कंटेंट क्रिएशन पर फर्क पड़ेगा? हालांकि मेरे जो दूसरे साथी जो मीडिया से अलग प्राइवेट कंपनियों में काम करते हैं उनकी हालत भी बुरी है. सेल्स और मार्केटिंग वाले दोस्तों ने बताया है कि कंपनी ने सेल न होने पर सैलरी देने से मना किया है. वे कहते हैं मार्केटिंग का यही फंडा है. इसीलिए मैं ये तुलना करने से बचना चाहता हूं कि किसकी स्थिति ज्यादा बुरी है या किसकी अच्छी. ये बहुत असंवेदनशील तुलना होगा. हमें नहीं मालूम किसकी क्या लाइबिलिटी है. देख रहा हूं लोग सोशल मीडिया पर लोग चिंता जता रहे हैं. पूछ रहे हैं रेंट कैसे दिया जाएगा. घर की ईएमआई कैसे भरी जाएगी. बच्चों की स्कूल फीस का क्या होगा. दूसरे घरेलू खर्चे. कुछ नहीं तो सैलरी क्लास अपने हिसाब से एक स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग मेंटेन करता है. वो कैसे मेंटेन होगा. यह प्रिविलेज तो है. लेकिन प्रिविलेज का एक झटके में खत्म हो जाना मानसिक तनाव का एक भयानक कारण हो सकता है. बीमारी, मौत, लॉकडाउन और नौकरियां के खात्मे ने पैनिक और एंजायटी का माहौल तैयार कर दिया है. जिस मीडिल क्लास ने लॉकडाउन की शुरूआत को हैपनिंग बनाया वो इसके आखिरी चरण में आते-आते सुस्त हो गया. वे सारे इंस्टाग्राम और फेसबुक वाले चैलेंज, खाने की तस्वीरें शेयर करना, वीडियो चैट, वीडियो गेम का रोमांच इक्कीसवें दिन में ठंडा पड़ चुका है. ये चैलेंज और किचेन रोमेंटेसिज्म अब जीवन में कोई वैल्यू-ऐड करता नहीं दिख रहा. सब जानने लगे हैं कि ये दिल बहलाने के ख्याल हैं. सच यह है कि हम लॉकडाउन में हैं. ऑफिस से छुट्टी लेकर घर में परिवार के साथ समय बिताना और हर दिन घर में होकर भी परिवार के साथ न हो पाने में फर्क है. वर्क फ्रॉम होम वाली कंपनियों के भी तो हाथ-पैर फूल गए हैं.
अभी-अभी प्रधानमंत्री ने ऐलान किया है कि लॉकडाउन को 3 मई तक बढ़ाया जा रहा है. राज्य सरकारों और जिला प्रशासनों को हॉटस्पॉट चिन्हित करने हैं. रेड, येलो और ग्रीन जोन बनाए जाने हैं. जहां पर कोरोना के मामले न हो वहां 20 अप्रैल से सशर्त कुछ आर्थिक गतिविधियां शुरू की जा सकती हैं. प्रधानमंत्री से पूछने को तो कई सवाल हैं. लेकिन जवाब नहीं मिलेंगे. उनका ट्रैक रिकॉर्ड ही वन वे कॉम्यूनिकेशन का रहा है. वे ही बोलेंगे. वे ही जनता से हर बार मांगेंगे. गलती करने पर भी वे महान. माफी मांगने पर भी वे महान. वही नोटबंदी के अर्थशास्त्री. वही बच्चों को परीक्षा पास कराने वाले मेंटॉर. प्रधानसेवक भी वही. व्यापारियों के व्यापारी भी वही. उनकी हर चाल मास्टरस्ट्रोक. और जो फ्लॉप हो जाए वो विरोधियों की साजिश. कहने का मतलब उनके मुख से निकले हर बात को सच और सही साबित करने वाला जिम्मा आईटी सेल के कंटेंट राइटर्स की प्राथमिक जिम्मेदारी. मंत्री-संत्री तो पहले भी ऐसे होते ही थे. नया भी नया नहीं रहा लेकिन बस कहने के लिए ही सही - हमने और आपने जो अपने आंख, कान और दिमाग का महादान दिया है..क्या इस वक्त कम से कम जैसे ईपीएफओ वाले जैसे कुछ रियायत दे रहे हैं, वैसे ही अपनी आंख, कान और दिमाग का थोड़ा हिस्सा आईटी सेल से वापस मांग सकते हैं? मैं कहता हूं थोड़ा ही मांगिए. पूरा मत मांगिए.
अब दाहिने हाथ में जल, पुष्प, अक्षत और सिक्का लेकर ध्यान कीजिए -
हे राजन, हम मीडिल क्लास के वंशज हैं. हमने आपके लिए क्या नहीं किया. ताली और थाली तो हाल की बात है. उसके पहले भी आपने जो कहा हमने किया. हमने घरों में आपके लिए रिश्ते-नाते खराब कर दिए. भाषा का लिहाज छोड़ दिया. गांधियों के काल में जिस राजनीति से हमें विरक्ति हो चुकी थी, वहां हम सक्रिय हुए. जहां-जहां संभव हुआ आपके लिए माहौल बनाया. हिदूं हृदय सम्राट का प्रचार किया. पुराने बताए इतिहास को त्यागकर आपके इतिहास को अपना लिया. आपके हर एक कार्य को ऐतिहासिक बताया. बच्चों को साइंस पढ़ाने की जिद करने वाले भद्रजनों ने राजन, आपके कहे अनुसार भगवान गणेश के नाक की प्लास्टिक सर्जरी में विश्वास जताया. आपने जब-जब जो भी मांगा हमने दिया. पुराने नोट दिए. धंधे में मोटी जीएसटी दी. आपके मंत्री ने कहा कि अर्थव्यवस्था का आंकलन सिनेमा के बॉक्स ऑफिस क्लेक्शन से करो, हमने माना. आपके साम्राज्य को जब भी खतरा पहुंचाने की साजिश विरोधियों ने रची हमने उसके खिलाफ अपनी नसें तान दीं.
राजन, आपके राजकाज में मनरेगा की बत्ती बन गई. हमने कुछ नहीं कहा. किसान आत्महत्याएं करते रहे. हमने खुद को फर्क पड़ने नहीं दिया. स्मॉल और मीडियम स्केल इंडस्ट्री (अगरबत्ती, चूड़ी, झाडू, पापड़, हस्तकरघा आदि) खून के आंसू रो रही है. आपके राजकाज में सीएए-एनआरसी को लेकर देशभर में आंदोलन खड़ा हो गया. हमने हर बार कहा- काग़ज़ हमीं दिखाएंगें. पाकिस्तान को हर रोज हमने अपने घरों में मारा. मुसलमानों को राक्षसी प्रवृत्ति का साबित किया. आरक्षण खत्म करने के जो भी हथकंडे आपने अपनाए. हमने उन सब में आपका साथ दिया. गाय को अपनी माता से पहले रखा. राजन, सबसे बड़ी हमारी निष्ठा का सबूत तो यही है कि डंवाडोल अर्थव्यवस्था, भयावह बेरोजगारी के बावजूद हमने बालाकोट में हुए हमले को तरजीह दी. आपको सशक्त कमांडर मानते और बताते रहें. अपने क्षेत्र के सांसदों के घटिया प्रदर्शन पर भी सिर्फ कमल छाप पर वोट दिए. हमने तो नगर निगम के काम पर कभी वोट नहीं दिया. विधायकी का निर्णय भी यही सोचकर लिया कि बॉडर पार पाकिस्तान में पटाखे न छूटने पाएं. आपका चेहरा जो हमेशा दिलों दिमाग में था राजन. न कभी हॉस्पिटल और अस्पताल पर लेफ्टिस्टों की तरह मांग की. हमारे बच्चे वैसे तो प्राइवेट में ही पढ़ते हैं. फिर भी हमने कभी फीस-वीस को लेकर शिकायत नहीं की. बच्चा टायं-टायं इंग्लिक्श स्पीकिंग, माई करेजा फूलिंग हाइ. आई फील वेरी प्राउड. जब ईवीएम में टीं-टीं आवाज़ होता था - आएगा तो मोदी ही! चलने लगता था मन में. मने-मन झुनझुनाने लगते थे राजन.
अभी जब हज़ारों मजदूर दिल्ली और मुंबई से अपने गांवों की तरफ जाने के लिए बस अड्डों और ट्रेनों में भरकर जा रहे थे तब भी हमने आपका साथ दिया. हमने उन्हें कोरोनावायरस का कैरियर बताया. कहा कि ये जाहिल और गंवार शहरों से कोरोनावायरस लेकर गांवों तक जा रहे हैं. डर्टी पिपल. शेमलेस फेलो. बोला कि मारो सालों को. जबतक इनका गांड लाल न करे पुलिस ये नियम कानून थोड़े ही मानेंगे.
पर ये क्या प्रभु? अगले ही बीस दिनों में आपने हमें भी ऐसी स्थिति में ढकेल दिया. आपने कहा घरों में आने वाली नौकरों-नौकरानियों को तनख्वाह दो. हमने दिया. दूसरे किरायेदारों से कहा कि वे रेंट न लें. इंसान बनें. लॉकडाउन की सफलता से जुड़ी सैकड़ों व्हाट्सएप फॉरवर्ड किए हैं राजन. आप चाहें तो हमारा व्हाट्सएप हैक करवा लें. हमने बताया है कि कैसे अमेरिका और इंग्लैड समय से लॉकडाउन करने में चूक गए. बावजूद इसके राजन, हमारे गले पर तलवार लटक गई है. हम अभी भी सारा दोष सिस्टम पर मढ़ देंगे. बस आप आश्वस्त कीजिए कि हमारी नौकरियां बचेंगी.
राजन, आपके आने के बाद हमारी जाति मीडिल क्लास रह गई है. शादी अभी भी नहीं करते हैं दूसरे जात में. लेकिन कम से कम यादव-कुर्मी भी भूमिहार-राजपूत की तरह ईवीएम टिटिंयाता है नेशनल इलेक्शन में. एक और बहुत जरूरी बात राजन. जिनकी नौकरियां जा रही हैं. वो सब आपके भक्त नहीं हैं. उनमें से कुछ लोग बहुत पहले से अर्थव्यवस्था को लेकर लिख-बोल रहे थे. कभी-कभार राहुल गांधी का तारीफ भी किया करते. उन्हें मालूम था कि राजन ने प्रजा के स्वास्थ्य इंतज़ाम नहीं किए हैं. अगर कोरोना बढ़ा तो देश में भारी तबाही मच जाएगी. राजन के हाथ से चीजें निकल जाएंगीं. वैश्विक मंदी मुंह बाये खड़ी है. राजन, वे लोग यह भी कहते हैं कि अगर राज्य के खजाने भरे होते तो शायद तबाही का ये मंजर थोड़ा कम खतरनाक होता. कुछ लुटेरे खजाने लूटकर भाग चुके हैं. कुछ भागने के फिराक में हैं. कुछ अभी थोड़ा बहुत सीएसआर करते नज़र आ रहे हैं. वे लोग बताते हैं कि राजन के उनसे घनिष्ठ संबंध हैं. कई दफे तो राजन उनके ही प्राइवेट पुष्पक विमान से उड़ते भी हैं. खैर, राजन इसे हम बुरा नहीं मानते. अगर राज्य का सारा काम ही उसके मुनाफे के लिए हो रहा है तो हल्का-फुल्का अपना फायदा ले लेने में कोई हर्ज नहीं है. पर राजन मैं आपका ध्यान अपने साथ हुए विश्वासघात पर दिलाना चाहूंगा. ये जो लोग आपके राजकाज की तथाकथित सच्चाई जानते थे. आप मेरी निष्ठा का अंदाजा लगाओ. मैं अभी भी सच्चाई के आगे तथाकथित लगा रहा हूं. वे कुछ हद तक मानसिक रूप से तैयार भी थे कि कुछ बुरा हो सकता है. लेकिन राजन हम जैसे भक्त. जिन्हें हमेशा यही लगता रहा कि डंका बज रहा है. कभी देश में, कभी विदेश में. उनके साथ ये धोखा क्यों राजन? हमें ऐसे हालत में मत डालो राजन कि ये हमारे लिए गांड के घाव के जैसा हो जाए. न देखे के, न दिखावे के. घुट-घुटकर जीने से बचा लो राजन. मैं फिर से दोहरा दिए देता हूं राजन कि मैं नीयत से नमकहराम हूं. आप चाहे सबको बेरोजगार कर दो पर हमारी नौकरी बचा दो..मैं ये सारा दोष सिस्टम को देने को तैयार हूं. सिस्टम अदृश्य है. राजन सिस्टम से हटकर हैं. मैं बरगलाने वाले मैसेज तैयार कर लूंगा. आप उसकी चिंता मत कीजिए. पर हमारे बारे में सोचिएगा.
अब आंखें खोल लीजिए. पुष्प, जल, अक्षत और सिक्का छत पर रखे गमले में डाल दीजिए. गमले में रोज पानी डालिए. पौधा बड़ा होगा. अच्छा महसूस होगा.

दूरगामी लेख लिख ही दिया आपने। चंद दिनों बाद ऐसी ही परिस्थितियां बन सकती हैं, लेकिन दोष तो मुसलमानों पर मढ़ा जा ही चुका है मीडिया पोषित जनता द्वारा।
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