डियर NIT श्रीनगर, सोशल साइंस आपके साथ है आप कब हमारे लिए आगे आएंगें?
अकादमिक संस्थानों पर हमलों का ताजा पड़ाव- एनआईटी श्रीनगर. बताते चलें कि इसकी स्थाप्ना 1960 में हुई और पहली दफ़ा कैंपस को सुरक्षा छावनी में तबदील करने के नौबत आई.
विशुद्ध रूप से एक इंजीनियरींग कॉलेज जहां ना तो कोई औपचारिक तौर पर छात्र संगठन होती है ना ही कैपस पॉलिटिक्स में उनकी खास दिलचस्पी. पढ़ाई-लिखाई और प्लेसमेंट में ढ़ले आम प्रोफेसनल कॉलेज की तरह ही एनआईटी श्रीनगर भी रहा. लेकिन, भारत-वेस्ट इंडिज़ मैच से उत्पन्न तनाव इस कदर रंग लेगा इसकी उम्मीद किसी को न थी.
छात्र दावा कर रहे कि कश्मीर के लोकल बच्चे बाहरी बच्चों को परेशान कर रहे हैं. भारत के राष्ट्रीय ध्वज़ का अपमान किया गया. विरोध मार्च करने पर बच्चों को पुलिसीया लाठीचार्ज़ झेलना पड़ा. छात्रों के साथ इस बर्बरता की जितनी निंदा की जाए कम ही होगी. लेकिन, यही वक्त है हम समस्या की तह तक पहुंचे बजाय़ कि एक राष्ट्रवादी कुंठा उत्सर्जन की मशीनरी बन जाएं.
गौरतलब़ हो, क्या आज जिस दिक्कत का सामना श्रीनगर में बाहरी छात्र कर रहे हैं वो दक्षिण, पूर्वोत्तर राज्यों में नहीं है? और, क्या यही दिक्क़त काश्मीरियों के साथ इस पूरे देश में नहीं है? आप उन्हें कितनी इज्ज़त देते हैं बाहर? पिछले वर्ष दिल्ली में मणिपुर की छात्र की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई और इसके प्रतिक्रिया में पूर्वोत्तर में बाहरी छात्रों के साथ देखने को मीली. दक्षिण के कॉलेजों में भाषाई आधार पर जबरदस्त लामबंदी है. आए दिन छात्र नॉर्थ-साउथ खेमे में बंटें होते हैं.
हालांकि, श्रीनगर मसले में छात्रों पर बर्बरता का एक राष्ट्रवादी चश्मा है. श्रीनगर के लोकल छात्रों ने बाहरी छात्रों को राष्ट्रीय ध्वज़ फहराने से रोका. हाँ, बिल्कुल ये अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ है. जिसे भी राष्ट्रीय ध्वज़ फहराना हो वो जरूर फहराये और संस्थान उसे ऐसा स्पेस मुहैया करवाये जहां वो अपनी अभिव्यक्ति को बिल्कुल स्वच्छंद हो.
हाँ, लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी एकतरफा नहीं दोतरफा होनी चाहिए. आपको काश्मीरियों के अभिव्यक्ति के आजादी पर भी कतरनी नहीं चलानी होगी. क्या आप तैयार हैं? इसका इल्म़ होना जरूरी है क्योंकि आये दिन काश्मीरियों के साथ ये भेदभाव होता आ रहा है. उन्हें शक़ के बिनाह पर रखा जा रहा है और उसकी एक प्रतिक्रिया श्रीनगर है. खैर मनाइए, आपके देश पूरा देश खड़ा है लेकिन काश्मीरियों के अधिकारों के साथ खड़े होने लोग आंतकी और पता नहीं क्या-क्या कहकर सलाखों के पीछे धकेल दिये जा रहे है. स्पष्ट कर दूं, मैं बाहरी छात्रों पर हुए हमलों को न्यायोचित नहीं ठहरा रहा लेकिन जड़ तक पहुंचने की अपील कर रहा हूं.
आप मीडिया को गाली दे ही रहे हैं, साथ ही जम्मू-कश्मीर सरकार को मत बख़्शिएगा. चाहे हम सोशल साइंस से हो, डीयू-जेएनयू से हो लेकिन छात्र पहले हैं और ये छात्र एकता जिंदाबाद होनी चाहिए. इस लड़ाई को सांप्रदायिक बनाने की कोशिशें चल रही हैं लेकिन ये संघर्ष सांप्रदायिक नहीं बल्कि अभिव्यक्ति की आजादी का संघर्ष है और इसे हम लेकर रहेंगें. बता दीजिए उन्हें, हमें इसपर कोई समझौता नहीं करना है. हम झंड़ा फहराये, गाना गाएं, संगोष्ठी करें, चाहे कुछ भी करें हमें तुम्हारी पहरेदारी नहीं चाहिए.
वैसे, इंजीनियर्स/मैनेजमेंट/डॉक्टरी व अन्य प्रोफेसनल कोर्स के बच्चों को इस घटना से कुछ बुनियादी बातें तो सीख ही लेनी चाहिए. आज हमला जब इंजीनियर्स पर हुआ है तब भी सोशल साइंस उनके लिए खड़ा है, अपनी आव़ाज बुलंद कर रहा है लेकिन बंधु आप हमारे लिए कब आगे आएंगें? जिस धरना-प्रदर्शनों, पढ़ाई-राजनीति को अलग-अलग देखने का नजरिया आपने बनाया आज उसी की जरूरत आपको आन पड़ी, फिर उनका इतना माखौल क्यों उड़ाया? क्या जबतक हमले आप पर सीधे नहीं होंगें आप खामोश ही रहना पसंद करेंगें? अगर हाँ, तो Martin Niemoller की ये कविता आपके लिए-
First they came for Socialist, I didn't speak up -- because I was not Socialist.
Then, they came for Trade Unions, I didn't speak up -- because I was not Trade Unionist.
Then, they came for Jews, I didn't speak up -- because I was not Jew.
Then, they came for me, I looked around -- because there was no one left.
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