युवाशक्ति: अनिश्चितताओं से अराजकता तक

मई-जून की गर्मी और इस बीच तमाम तरह की परिक्षाएं (प्रवेश से लेकर सत्र तक की) तापमान को और भी बढा देती हैं। इस दिमागी तापमान के बढने की वजह है भविष्य को लेकर अनिश्चितताएं। बचपन से ही हमें अर्जुन के तरह लक्ष्यधर्मी होनी की शिक्षा दी जाती है पर एक उम्र और समय आने पर हमारी लक्ष्यधर्मिता भटकती जान पडती है।

       आर्टस में स्नातक और स्नातकोत्तर के अंतिम वर्ष के छात्र-छात्राओं को बहुत करीब से देखने समझने का मौका मिल रहा है। जिसने अपना लक्ष्य तय भी कर रखा है उसे भी 'बैकअप" प्लान लेकर चलना पड रहा है। मन में एक अनिश्चितता बैठी है-"अगर ये नहीं हुआ तो?" तमाम तरीकों के प्रवेश परिक्षाओं और साक्षात्कार से गुजर रहे हैं। अर्थात विकल्प तैयार कर के रख रहे हैं। पर आज छात्रों को ऐसे विकल्प की जरुरत क्यों है? क्या छात्रों के आत्मविश्वास में कमी है?

   दूसरे सवाल पर दो मत हो सकते हैं। पहला,कुछ इसे सीधे तौर पर आत्मविश्वास की कमी के तौर पर देखेंगे। दूसरे, इसे अनिश्चितताओं से उपज रही अक्षमता के तौर पर देखेंगे। पर अगर आज बारीकी से देखें तो दूसरा मत पहले मत से ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता दिख रहा है जो सीधे तौर पर हमारे शिक्षा प्रणाली से लेकर व्यवस्था तक जुडा है।

    एरिक हॉफर की मानें तो-'युवा स्वयं में एक प्रतिभा है।' ऐसी प्रतिभा जिसे अगर सही दिशा न मिले तो वह आत्मघाती हो सकता है।

    यह एक ऐसा दौर है जब हिंदुस्तान जवान हो रहा है। तकरीबन आधी आबादी 50 वर्ष से कम उम्र की है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिती यह है भारत की नियामक राजनितिक-प्रशासनिक-विश्वविद्यालयी और आर्थिक शक्तियां इसके लिए तैयार नहीं हैं।

युवाओं को कैसे और किस दिशा में ले जाना है यह नेतृत्वकर्ताओं में साफ नहीं है। विश्वविद्यालयों में न तो सभी इच्छुकों के लिए जगह है, न ही नये विचारों और शोध संभावनाओं के लिए।
    
युवाओं की प्रतिभा को पल्लवित,पुष्पित होने के लिए खुले अनंत आकाश की तरह अवसर मिलना जरूरी है और यह तभी संभव है जब युवाओं को बेहतर एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था मिले। शिक्षा प्रणाली ऐसी हो जिसमें विविधता,वैज्ञानिक बोध,तार्किकता,आत्मविश्वास, आत्मसम्मान एवं उत्तरदायित्वबोध संपन्न बनाये।

आज भी बीए एवं एमए की अहमियत बनी हुई है पर इनमें युवाओं को रोजगार देने की क्षमता नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय ने चार साल के स्नातक स्तरीय पाठ्यक्रम के पक्ष में छात्रों को बाजार के लायक बनाने का ही तर्क दिया था पर गुणवत्ता से समझौता भी कर लिया। दरअसल,युवावस्था  उपयोगिता के सिद्धांत के प्रतिरोध के कारण ही विलक्षण है। युवाओं के जीवन का उद्देश्य किसी खांचे में समा जाना नहीं होना चाहिए।

कई बार ऐसा देखने को मिलता है की इसी जद्दोजहद में युवा शोर्टकट की खोज में है। उसके लिए स्वस्थ विकल्प न तो बाजार में है और न अपने जिला-जवार में। हालत यहाँ तक दैनिय है कि पीएचडी की ड्रिगी प्राप्त शिक्षक भी वर्षों से विश्वविद्यालयों में कांट्रैक्ट पर सेवा दे रहे हैं। जब एक शिक्षक ही अंधेरे में हाथ-पांव मार अपनी अनिश्चितताओं से संघर्ष कर रहा हो तो ऐसे में छात्रों की अनिश्चितताएं खत्म करना दिवास्वप्न ही होगा।

    अगर स्थितियां ऐसी ही बनी रही तो एक अराजक कल की आशंका से इंकार नहीं किया सकता। देश के युवा को अंधेरे अनंत आकाश में  खोने से बचाना होगा।

-रोहिण कुमार
दिल्ली विश्वविद्यालय

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