मर्ज,मरीज और दवा
मर्ज,मरीज और दवा। मरीज कौन है? जो बीमार है। बीमार कौन है? जो अस्वस्थ है। स्वस्थ्य कौन है? जो बीमार नहीं है। सवाल बडे मामूली प्रतीत तो हो रहें हैं पर इन सवालों की अपनी धुरी है जिसपर आम आदमी घुमता रह जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रदत्त परिभाषा के अनुसार स्वस्थ होने का अर्थ है-"शारिरीक मानसिक और सामाजिक रुप से पूर्णत: स्वस्थ होना,न कि केवल रोग या दुर्बलता का कम हो जाना।" अगर इस परिभाषा को समकालीय दृष्टिकोण से देंखे और खासकर दिल्ली जैसे महानगरों के परिपेक्ष्य में तो शायद ही कोई स्वस्थ है।
पर अगर अस्वस्थ है तो कैसे? क्या दिल्ली बीमार है? पूरी दिल्ली कैसे बीमार हो सकती है? 1,483 वर्ग में फैली संपूर्ण राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की कुल आबादी 1,82,48,290 करोड है। इतनी संख्या में तो दिल्ली के अस्पतालों में न तो बेड ही हैं न ही पर्याप्त चिकित्सीय सुविधा। मतलब, बीमारी के भी प्रकार होतें हैं। हर शारिरीक अस्वस्थता बीमारी की श्रेणी में नहीं डाली जा सकती भले,वो अस्वस्थता दीर्घकाल में बीमारी में बदल जाए।
सामान्यतः, साधारण सर्दी,खांसी,बुखार ज्यादा चिंतित नहीं करती है जबतक कि समस्या ज्यादा दिनों तक न रहे। अस्पतालों और चिकित्सकों की जरूरत अमूमन तत्कालिक और गंभीर बीमारियों के समय ही पडती है। किस बीमारी के लिए कहाँ जाना है, कब किसी विशिष्ट चिकित्सक के पास जाना है, कबतक चिकित्सक की सलाह नहीं लेनी हैं, लेनी है तो किससे लेनी है,इन सारे सवालों के जबाव स्वत: हमारे पूर्वाग्रहों एवं अनुभवों के आधार पर मन में तैयार होते हैं। कई बार तो इन्हीं के आधार पर दूसरों को भी परामर्श भी देते हैं।
घर में बीमार कोई एक होता है पर समूचा घर पीडित हो रहा होता है। मानसिक अस्वस्थता तो होती ही है,कई बार सामाजिक भी पर अगर अभिजात्य वर्ग को छोडकर देखें तो आज आर्थिक पक्ष बाकी दोनों से सुदृढ हो चुका है। बैंक बैंलेस से लेकर पीएफ तक और कुछ प्रचंड स्थितीयों में तो घर-जमीन-जायदाद तक शून्य बटा सन्नाटा हो जाते हैं।
छोटे-छोटे गांव-कसबों से शहरों और महानगरों के तरफ पलायन करते लोग। ट्रेन में झोला लादे चालू डब्बों में धक्के खाते हुए एम्स और सफदरजंग की पटरियों को ठिकाना बनाने को मजबूर हैं क्योंकि उन्हें 'अपनों' की चिंता है। उन्हे अपनों की सलामती की फ्रिक है। अगर उनके चिंता के तह में जाया जाए तो उनकी चिंता बहुमुखी जान पडेगी,जो बेहद चिंतनीय है।
अस्वस्थता के कारक
अस्वस्थ होने के कई कारण हो सकते हैं पर प्रमुख्यत: बीमारी के कारणों में एक कारण हमारे पर्यावरण से बडी शिद्दत से जुडा है। पर्यावरण उन सभी भौतिक,रसायनिक एवं जैविक कारकों की समष्टिगत इकाई है जो किसी भी पारितंत्रीय आबादी को प्रभावित करते हैं साथ ही उनकी जीवन और जीविता का पैमाना भी तय करते हैं। आज मनुष्य अपने आर्थिक उद्देश्यों एवं विलासिता के जाल में इस कदर उलझ गया कि उसे इन लक्ष्यों की प्राप्ति 'विकास' दिखते हैं और इसके आडे आने वाले हर अवरोध को भेदना उसे 'विकासशील' बनाते हैं। पर्यावरण दोहन से पनपती समस्याएं को झेलते हुए भी उसे इसकी अहमियत शायद ही समझ आ रही है। शायद,वो उपभोक्तावाद के चंगुल में मजबूर हो चुका है। बेचारा,बेबस है।
यूं तो पर्यावरण से संबृद्ध समस्याएं बहुत हैं पर पर्यावरण को स्वास्थ से जोडकर देखें तो वायु और जल का हमारे स्वास्थ्य पर जबरदस्त प्रभाव पडता और पड रहा है। बहुत बडी आबादी इससे प्रभावित हो चुकी है,हो रही है और अगर ऐसे हालात बने रहें तो,होती रहेंगीं। आज से भी ज्यादा गंभीर और प्रचंड।
बीमारी की हवा
वायु प्रदूषण से स्वास्थय को बढते खतरे को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं अन्य राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय संस्थानों ने कई बार सियासतदारों एवं वैश्विक आवाम को चेताया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के ताजा अध्ययन के मुताबिक दुनिया भर में स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले पर्यावरणीय कारकों में वायु प्रदूषण पहले स्थान पर है,जो हर आठ में से एक मौत के लिए जिम्मेवार है। जब दुनिया की औसतन हकीकत यह है तो जनसंख्या के आधार पर दूसरे नंबर पर भारत की स्थिति का अंदाजा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है।
दुनिया के सोलह सौ शहरों में हवा की गुणवत्ता पर हुए अध्ययन में भारत की राजधानी दिल्ली की दशा सबसे खराब है। कुछ वर्ष पहले तक यह 'शोहरत' चीन की राजधानी बिजिंग को प्राप्त था। गौर करने वाली बात है कि दुनिया के बीस सबसे ज्यादा वायु प्रदूषण वाले शहरों में तेरह अकेले भारत के हैं। सांस फूलने,आंखों में जलन,त्वचा,हृदय रोग,रक्त विकार आदी जैसी समस्याएं बडी तेजी से अपने पांव पसार रही हैं।
राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने दिल्ली में वायु प्रदूषण से बढते खतरे को लेकर कुछ सख्त फैसले लिए हैं। दस वर्ष पुरानी डीजल वाहनों का बैन किया जाना, खुले में कूडा-करकट जलाने पर पांच हजार रुपए तक के जुर्माना का प्रावधान जैसे कुछ बेहद जरूरी कदम उठाए हैं। पर इन आदेशों के सुचारू कार्यान्वयन की जांच करनी होगी। वैसे,दिल्ली सरकार भी प्रदूषण के मसले को गंभीरता से लेती दिख रही है। सरकार ने औद्योगिक समूहों को कठोर निर्णयों के लिए तैयार रहने को कहा है। वर्तमान सरकार ने अपने घोषणापत्र में भी प्रदूषण नियंत्रण को लेकर कई वादे किए थे जैसे नवीन ऊर्जा साधनों के इस्तेमाल को बढावा दिया जाना, दिल्ली को अतिक्रमण और वननाश किए जाने से बचाना,सार्वजनिक वाहनों को बढावा देना,वृक्षारोपण करना,शहर की साफ-सफाई के लिए वैक्यूम मशीनों का इस्तेमाल होना, सीएनजी और बिजली जैसे कम प्रदूषण उत्सर्जन करने वाले ईंधनों को ज्यादा से ज्यादा प्रयोग में लाना और मिलावटी ईंधन के धंधे पर सरकारी चाबुक चलाना। पर वादें हकीकत में परिवर्ततित हो रहें है या नहीं इसकी पडताल जरूरी है।
ये तो बात हुई शहरों की पर क्या गांवों में भी हालात ऐसे ही हैं? क्या गांवों में भी इतनी ही गाडियाँ हैं या गांव में रहने वाली आबादी का भी लक्ष्य विलासिता प्राप्ति ही है? गांव और शहर के "विकास' में अंतर है? है तो क्या है? नहीं है तो क्यों नहीं है? क्या गांव शहर बनना चाहते हैं? जब शहरों के हालात इतने अस्वस्थयकर हैं फिर भी गांव शहर क्यों बनना चाहते हैं?
बहरहाल,गांव भले ही शहर बनने को आतुर हों पर शहर गांव बनने को कतई तैयार नहीं हैं। दोनों एक अलग सी सनक में हैं। दोनों के मजबूर नजरिये हैं। शहर को झेल रहे इंसान के लिए गांव का चित्रण-हरियाली,शुकून की जिंदगी,आपसी मूलभाव,ताजी हरी साग-सब्जियों का सेवन,प्रदूषण मुक्त जीवन आदी। गांव में शहर का चित्रण-अच्छी शिक्षा,अस्पताल,सडक,नौकरी और अन्य सुविधाएं। एक को शहरी कहलाने में फक्र दूजे को देहाती गाली लगती है। क्या गांव थोडा शहर और शहर थोडा गांव नहीं हो सकते? ऐसी संकल्पना करना कहीं विकास विरोधी तो नहीं बना देगा? काश,दोनों एक दूसरे की नासमझी पर विमर्श करते तो आज स्थितियाँ कुछ और होतीं।
बेहतर शिक्षा की आस में गांवों की एक बडी आबादी शहरों के तरफ पलायन कर चुकी है और यही की हो कर रह गई है। एक दूसरी आबादी भी निरंतर शहरों का रुख कर रही है,वो है बेहतर चिकित्सा के आस में। गावों में चिकित्सीय एवं बेहतर सुविधाओं का आभाव उन्हें शहरों तक खींचता है। देर-सबेर उन्हें भी शहर अपना बना ही लेते हैं। पर्यावरणीय नुकसान की राजनीति शहर और गांव के बीच बिल्कुल वैसा ही खेल है जैसा अंतराष्ट्रीय स्तर पर विकासशील और विकसित देशों का। बाजार उपभोक्तावाद के सिद्धांत के अनुरूप आर्थिक विकास की आड में पर्यावरण को नष्ट करने में लगा है। पर नवउदारवाद के इस दौर में बाजार के प्रकोप से बच पाना भी मुश्किल ही है। जरूरत है, सरकारी एवं समाजिक व्यवस्था इस स्थिती के भयावह होने से पहले कोई ठोष इंतजाम करे।
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