रंग ज्यादा, मंच कम:- सॉरी मैम, बट महाराजा अग्रसेन को नुक्क़ड़ करने दिया होता..
डीयर मैम, सॉरी मैं लिखने की जुर्रत कर रहा हूं. कई बच्चे लिखने चाहते हैं, बोलना चाहते हैं लेकिन सुविधानुसार चुप्पी साधे हैं. उन्हें लिख या बोल देने के बाद जो होगा उसका डर सता रहा है. ऐसी परिस्थितीयों से मैं और भी व्याकुल हूं. हो सकता है मैं एक नौसीखिया लेखक या बीस-बाईस साल का लौंडा हूं, जवानी के जोश में लिखे जा रहा हूं...
मैम, आप बहुत अच्छी होगीं लेकिन नुक्कड़ आपकी जगह नहीं थी. आप कहेंगीं- "भला एक स्टूडेंट बताएगा मुझे क्या गलत क्या सही?"
मैम ये सच है मैं ना तो तीन में हूं ना ही तेरह में, लेकिन मैम आप हमें सुन ही लेगीं तो कोई ऊंच-नीच तो नहीं हो जाएगी न? आखिर, आप हमारी शिक्षिका और हम आपके बच्चे ही तो हैं. अब इस रिश्ते में भी इगो क्लैस होगा क्या?
महाराजा अग्रसेन की टीम में आपके नियमानुसार 25 मेंबर ही होने थे लेकिन वो 33 रहे. आपको इससे आपत्ति थी. भला, वहां मौजूद किसको आपके इस बात से दोराय थी. किसी को भी तो नहीं थी. जिन्हें नुक्कड़ करना था वो खुद आपकी बात सरमाथे किये थे. वो डिसक्वालिफाई, निगेटीव मार्किंग, अंत में प्ले करने तक को तैयार थे लेकिन उन्हें पर्फोंम करने देने में क्या दिक्कत थी?
वैसे, आपको जब बाकि शिक्षकों ने समझाया आप वापस भी आई, प्ले दस मिनट देखा लेकिन अचानक ठनक क्यों गई ये हम दर्शकों के समझ भी नहीं आया. कहीं आपको आजादी वाले नारों से दिक्कत तो नहीं थी न? कश्मीर पर प्ले नहीं बनना चाहिए क्या? बस, पूछ रहा हूं. प्ले पूरा हो जाने दिया होता फिर सवाल जबाव़ कर लेती. लेकिन अचानक भड़कना कुछ जमा नहीं. मैम, हमें तो कश्मीरी पंडित वाले प्ले से भी परहेज ना होगा. उसपर विमर्श करेंगें लेकिन देखेंगे जरूर. ये दर्शक को तय करने देने में क्या परेशानी है कि क्या गलत है और क्या सही?
दो पैनलिस्ट जज़ शशांक और हादी सरमादी जो हमारे मेहमान थे उनके साथ बदसलुकी राम लाल की शोभा तो नहीं ही बढ़ाती. किसी आमंत्रित टीम को यूं दुत्कार कर भगा देना अकादमिक संस्था का कौन सा गौरवशाली क्षण रहा होगा. हमारी ड्रामैटिक सोसाइटी हसरतें आपसे हाथ जोड़ रही थी, प्ले होने देने को विनती कर रही थी, दर्शक आपसे सवाल कर रहे थे लेकिन आपने कहां किसी की सुननी थी. आपको सवाल अपने इगो पर हमले जैसे लगने लगे, आप बताने लगीं कि आप खुद रंगमंच की कलाकार रही हैं. आपके सामने हमारे जज पैनलिस्ट चले गए लेकिन आपने रोका तक नहीं. ये एक शिक्षण संस्थान के सांस्कृतिक महोत्सव का काला पक्ष याद किया जाएगा.
मैम, मैंने आपके फेसबुक टाइमलाईन की झलकियाँ देखी. आप बहुत सक्रिय हैं और राजनीतिक विषयों में रूचि रखती हैं. मुझे शिक्षकों का ये पक्ष बहुत लुभाता है. वो महज क्लासरूम-कोर्स नहीं बल्कि समसमायिक विषयों पर भी समाज के लिए नॉलेज़ प्रॉडूसर्स होने की जबाव़देही निभा रहे हैं. इंडियन एक्सप्रेस में प्रो.अपूर्वानंद का लेख "उमर ख़ालिद, माई सन" की आलोचना आपने लिखी. मैंने वो पढ़ा था लेकिन टाइमलाईन पर देखने के बाद मालूम हुआ आप हमारे कॉलेज से ही हैं. मैम, मैं विचारों के स्तर पर प्रो.अपूर्वानंद के साथ हूं लेकिन आपने इसका क्रिटीक लिखा. मतलब, लिखने-बोलने का मौका दोनों पक्षों को मिला और सही-गलत की जिम्मेदारी पाठकों पर छोड़ दी गई. मैम, नुक्कड़ के साथ भी तो हम यही मांग रहे हैं न.
पिछले दिनों श्री गुरू तेग बहादुर खालसा कॉलेज की अंकुर सोसाईटी, मुजफ्फ़रनगर बाकी है डॉक्युमेंट्री, संगवारी थीयेटर ग्रूप के प्ले को रोका गया और इसबार महाराजा अग्रसेन कॉलेज के साथ? मैम, ये तो कला के साथ अन्याय हुआ. अभिव्यक्ति पर कैंची क्यों?
शायद पहली दफ़ा, बच्चों ने नहीं बल्कि बुजुर्गों के उत्पात की चर्चा बाहर गई. कैंपस का एबीवीपी सहिष्णु है भले बाहर कुछ भी हो, असहिष्णु आप क्यों हो गई मैम? आखिर, मैम नुक्कड़-नाटक का मकसद क्या होता है? क्या प्रतियोगिता सिर्फ़ जीत-हार/ सर्टिफिकेट-ट्रॉफी के लिए होती है या वो बात रखने का एक मंच भी होता है?
आप सीनियर है. बच्चें आपसे खौफ़ खाते होंगे, ठेके पर काम करने वाले शिक्षक मुंह बंद रखना उचित समझते होंगे, पीछे में सौ तरह की बातें और समक्ष चाटुकारिता जो कि अकादमिक संस्था की नियती सी हो चली है, एक संस्था कैसे बच्चों को दबा सकती है इसके साक्षात उदाहरण देखने को आए दिन मिल रहे हैं. ऐसे में नुक्कड़-नाटक और हसरतें के साथ मैं अपनी आव़ाज बुलंद करता हूं. आप हमारी आव़ाज आसानी से कतर सकती हैं.
दिल से कहूं, आपने रंगमंच जरूर किया गया होगा लेकिन अब रंग ज्यादा और मंच कम होने लगा है. मेरी भला क्या औक़ात मैं आपको सलाह दूं. बस, खुद को अंदर से ना मरने देने के लिए लिख रहा हूं. बाहर के संघर्ष के साथ भीतर में एक संघर्ष चला रहा है. मैम, मैं पोस्टर ब्यॉय क्रांतिकारी बनने के लिए नहीं बल्कि भीतर के क्रांति को जीतना चाहता हूं इसलिए लिख रहा हूं.
हसरतें जिंदाबाद, नुक्कड़-नाटक जिंदाबाद, रामलाल जिंदाबाद, महाराजा अग्रसेन कॉलेज जिंदाबाद, दिल्ली विश्वविद्यालय जिंदाबाद, हमसब जिंदाबाद, दर्शक-दीर्घा जिंदाबाद!
-एक दर्शक
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