वेश्या शब्द ही आपत्तिजनक है तो इस शब्द को जीने वाली तमाम महिलाओं को मुख्यधारा में स्वीकृति कैसे मिलेगी?



वेश्या शब्द ही आपत्तिजनक है तो इस शब्द को जीने वाली तमाम महिलाओं को मुख्यधारा में स्वीकृति कैसे मिलेगी? मायावती जी, आप महिला नेत्री होने का फर्ज़ बेहतर नहीं निभा पा रही हैं.

वेश्या, रंडी, रखैल आदि शब्दों की उत्पत्ति कैसे हुई और ये गाली कैसे बन गए? ये शब्द आपत्तिजनक कैसे होते चले गए? इसपर शोध होना चाहिए. भारी उपद्रव से मायावती की अस्मत बचा ली गई या नहीं, पता नहीं. लेकिन, समूचे देश में तकरीबन तीस लाख वेश्याओं, तीन लाख से ज्यादा कोठों और ग्यारह सौ रेड लाईट एरिया में धकेली गई लड़कियों को एक समाज के रूप में हमने ठेंगा दिखा दिया.
मायावती के वेश्या कहे जाने को आपत्तिजनक बताने में ही सारी ऊर्जा खपा दी गई. पक्ष-विपक्ष सबने निंदा की, आम भद्रजनों ने भी इसका भरपूर निंदा की. गाय माता, औरत वेश्या वाली बाईनरी चस्पाँ कर आपत्तिजनक को सम्मानजनक बनाते रहे. लेकिन, हमने इस भेंडचाल में एक बार भी उन वेश्याओं के बारे में नहीं सोचा जिन्हें इस शब्द को जीना पड़ता है.

क्या उन वेश्याओं का पक्ष लिया गया? अगर एक शब्द से ही इतनी आपत्ति हो चली फिर, वेश्यावृति में धकेली गई लड़कियाँ या महिलाओं को मुख्यधारा में स्वीकृति कैसी मिलेगी? कुछ जो शौक़ से इस पेशे में हैं उन्हें समाज में सम्मानजनक जिंदगी सुनिश्चित कौन करेगा? इन सवालों के जब़ाव मुश्किल हों तो सामाज के रूप में हमें इसपर बहस कर लेना चाहिए कि- "क्या समाज को वेश्यालयों की जरूरत है? हालात से मजबूर सेक्स वर्कर्स लिए विकल्प कौन-कौन से विकल्प मौजूद हैं?" आदि.

मायावती को यह बता देना चाहिए कि यूपी में उनकी सरकार बनने के बाद सभी कोठों के लाइसेंस रद्द कर दिए जाएंगें, उन्हें नौकरी और सम्मानजनक जीवनयापन की सुविधा मुहैया कराई जाएगी.

कुछ दिनों पहले कंगना रनाउत ने एनडीटीवी बरखा दत्त को इंटरव्यू में कहा- "I am okay if people call me whore or phycopath." आगे उन्होंने कहा कि- "When women can answer with their success and sarcasm, why to use hands." ताज्जुब़ है कि सोशल मीडिया पर कंगना की वीडियो खूब शेयर की गई लेकिन मायावती के वक्त पर वेश्याओं के पक्ष पर बहस तो दूर खुद मायावती भी अबला नारी में खुद को तबदील कर गईं.

एक गरीब दलित परिवार से राजनीति में आना, कांशीराम जैसे सरीखे नेता के साथ काम करना, मुख्यमंत्री बनना, राष्ट्रीय राजनीति में अहम भूमिका निभाना..इसके बावजूद बहनजी ने महिलाओं की छवि को कमजोर ही किया. क्या मायावती यह कहकर उन वेश्याओं में ताकत नहीं भर सकती थी- "अगर दयाशंकर या भाजपा मुझे वेश्या समझती है तो इस देश की सारी वेश्याओं को मायावती बनना होगा!"
इससे शायद महिला नेत्री महिलाओं के पक्ष को बेहतर रखती, उन्हें सशक्त करतीं. हो सकता है आगे किसी महिला नेत्री के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग ना हो, पर क्या पितृसत्तात्मक समाज महिलाओं के लिए रंडी, वेश्या जैसे शब्दों का इस्तेमाल बंद कर देगा? शायद नहीं! तो मायावती ने क्या कुछ ऐसा किया या कहा जिससे महिलाओं के बीच कोई संदेश गया हो? उन्हें इससे जुझने का ज्जब़ा मिला हो..?

मतलब, मायावती के नेता होने मात्र से तो महिला सशक्तिकरण नहीं होगा न! सदन में मौजूद महिलाओं की इसी कमी के कारण अबतक महिला आरक्षण बिल पारित न हो सका..

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