गोबर थे, उपले हो गए !
"वाट् इज़ स्टेट?", शिक्षक सभी छात्रों से पूछ रहे थे. जब मेरी बारी आई मैंने कहा- "सर, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हिमाचल, पंजाब सब स्टेट हैं!"
उन्होंने मेरी बात को सुनकर भी अनसुना कर दिया. बिहार के गया शहर से आया लड़का जिसके लिए दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ना मालूमी बात नहीं थी, उसके लिए डीयू का पहला अनुभव सुखद नहीं ही रहा. ऐसी थी हमारी राजनीति विज्ञान की पहली क्लास और दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक से पहली मुलाकात.
भौतिक विज्ञान, रसायन शास्त्र, गणित (जिसे इंटरमीडिएट के छात्र छोटे में 'पीसीएम' कहते हैं) पढ़कर आया लड़का सामाजिक विज्ञान की क्लास में भला 'स्टेट' पर और क्या बोलता? लेकिन, पहली क्लास ने हमें आइना दिखा दिया था- 'हम कितने पानी में हैं!' समय बितता गया, दिल्ली को समझने और महसूस करने की प्रक्रिया जारी रही. इस प्रक्रिया में सबसे बड़ा फायदा हुआ कि हमारी भाषा जिसपर क्षेत्र का बड़ा असर था, सुधरने लगी. सरोजनी में ठग ना लिये जाने के डर ने हमें दिल्ली के 'मैं-तू' टोन में ढ़ाला. वाक्य विन्यास में 'हम' की जगह 'मैं' ने ले ली.
जहाँ एनसीईआरटी की किताबों के आगे कुछ देखना तक जरूरी नहीं लगता था वहाँ मोटे-मोटे पसेरी भर के स्टडी मैटेरियल खरिदने को सर ने कहा. ये हमारे लिए किसी जुल्म से कम नहीं था. उन स्टडी मैटेरियल की उच्च स्तरीय अंग्रेज़ी और उनके तर्क हमारे पल्ले नहीं पड़ते जबतक सर उसे तोड़कर आसान और सरल नहीं करवा दिया करते. हमेशा हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर पकड़ बनाने को कहते. आईआईएमसी के शिक्षक जब हमें अनुवाद पढ़ाते हुए बताते हैं कि एजेंसी से खबरें अंग्रेजी में आया करेंगी और उसे हिंदी में अनुवाद करना होगा तो मुझे डीयू के उस शिक्षक की बहुत याद आती है.
हमारी शुरूआत अच्छी नहीं हुई थी लेकिन पहली क्लास का असर ऐसा हुआ था कि हमने कुछ भी कहने से पहले दो बार सोचना सिख लिया. उस शिक्षक से दूरी बनाने के बजाय उनके पास जाने लगे. डीयू हमारे लिए चुनौती बन गई, खुद को साबित करने की चुनौती. खुद को निखारने की चुनौती. सर हमें लिखने के लिए प्रेरित किया करते. वो खुद सोशल मीडिया से परहेज करते थे लेकिन, हमें कहते कि आप युवा पीढ़ी को इसका सदुपयोग करना चाहिए. अपनी लिखी बातें हम उन्हें पढ़ने के लिए भेजा करते. वो पूरा पढ़ते और बताते कि क्या और जोड़ा जा सकता है. सबसे अच्छी बात वो कभी हमारे लिखे को गलत कहकर दरकिनार नहीं किया करते. हमेशा, 'रोहिण इस लेख में ये जोड़ सकते हो, इस पंक्ति की शुरूआत ऐसी अच्छी होगी..' और जब लिखे से असंतुष्ट होते तो बस इतना कहते-'अभी और पढ़िए', दो-चार किताबें, लेखकों के नाम बता दिया करते.
पढ़ाने के उस शैली ने हमें सवाल करना सिखाया, डिबेट-डिस्कशन में दिलचस्पी बढ़ने लगी, हमारे व्यक्तित्व में निखार आया. एक दब्बू सा बिहारी दब्बू नहीं रहा. क्लास खत्म होने के बाद जब हम चार दोस्त सर के पीछे-पीछे चल देते, क्लासमेट्स तंज किया करते- 'इन सालों को ही इंटर्नल में पूरे नंबर मिलेंगें!' सच तो ये था कि हमारा ही वाइवा लंबा चलता और कई बार अंकों का नुकसान भी झेलते.
आज के दौर में कौन शिक्षक अपने छात्र के लिए अस्पताल के चक्कर काटता है लेकिन, डीयू के इस शिक्षक ने किया. खून देने तक को तैयार हो गए. डीयू के हसीन सपने जो कॉलेजों में शिक्षकों की कमी, सुविधाओं के आभाव व अन्य दिक्कतों के कारण टूटते दिखे, सर एक ही बात कहते -'रामलाल सर्वश्रेष्ठ नहीं लेकिन बदतर भी नहीं है.' उनके पढ़ाने की शैली और छात्रों से आत्मीयता के भाव ने हमें हताश होने से बचाया.
कॉलेज लाइफ का एक हिस्सा बीत चुका है, हमें रामलाल से ज्यादा रूम नंबर एक से याद आता है जहाँ दिवार में सट भर जाने से कपड़े का रंग कथ्था हो जाता लेकिन अब उसकी विन्टेज वैल्यू का एहसास होता है.
कुछ दिनों पहले यूपी के देवरिया से खबर थी जहाँ एक शिक्षक के तबादले पर पूरा गाँव रो रहा था. उस शिक्षक की कैसी आभा रही होगी, छात्रों व उनके अभिभावकों से कैसे रिश्ते होंगे यह समझने के लिए हमें सिर्फ़ और सिर्फ़ सर के साथ आत्मीय रिश्ते को देखना था.
शिक्षक दिवस से पूर्व सर से रेस कोर्स मेट्रो स्टेशन पर मुलाकात हुई. बातचीत के क्रम में जब मैंने उन्हें पहली क्लास का संस्करण सुनाया, उन्होंने हंसते हुए कहा- 'गोबर आए थे, अब उपले बन गए हो.' और, मैं हंसने लगा. उनकी बातों से मुझे एहसास हुआ शिक्षक जानबुझकर भी बच्चों को झकझोरते हैं ताकि वो अपना सर्वश्रेष्ठ दे सके. 'गोबर' और 'उपले' का उदाहरण देकर उन्होंने एक बड़ी बात रेखांकित कर दी. गोबर का उपला होना जिसे बहुत स्वाभाविक माना जाता है. शिक्षक की एक लाइन ने हमें समझा दिया असल में उस स्वाभिक मानी जाने वाली प्रक्रिया में बहुत कुछ घट रहा होता है.
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