शिक्षक नहीं बचा, आप तो डिप्लोमा पत्रकार है महाराज
छात्रों का काम पढ़ना होता है. पांच साल से ज्यादा से पढ़ा रहे एडहॉक टीचर को बिना कारण बताये बाहर निकाला जा रहा है. आपको इसपर बोलकर लेफ्टिस्ट/नकस्ली होना या कॉलेज प्रशासन की नजरों में आना है क्या? आपको नहीं मालूम है प्रशासन कितनी गुरू-घंटाल होती है? वो क्या नहीं कर-करवा सकती है. इसलिए, आप पत्रकार है महाराज..निष्पक्षता और ऑब्जेक्टिवीटी वाली लाइन पकड़ लीजिए. नो मैटर आपकी चुप्पी में प्लेसमेंट बड़ी वजह हो! स्टैंड और प्लेसमेंट हैंड इन हैंड, सेफ गेम नहीं कहा जा सकता. खैर, पूछ लीजिएगा उनसे.
नरेन के साथ खड़े होने में दूसरे ग्रूप के एंटी दिखेंगे और अभी गुजारना है एक और सेमेस्टर! सीधा बोलिए - 'नरेन हमको नहीं पढ़ाते हैं. कौन नरेन हमको नहीं पता. जिसको जानते नहीं उसके बारे में कैसे बोल दें?' या ये भी ठीक है - 'बिना दोनों पक्षों को सुने हम पक्ष-विपक्ष कैसे चुन लें?'
अजी तो उनका भी पक्ष सामने ले आइए. कह दीजिए वो भी खुला पत्र लिखकर अपनी बात स्पष्टता से रख दें. नरेन को दुत्कारते हुए दूसरे पक्ष का झंडा थाम रहे हैं..और ऑब्जेक्टिव होने का ढ़ोल पीट रहे हैं. वैसे, ऐसा ही होता है. रामलाल में जब जीएन साईंबाबा पर एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने स्टाफ रूम में घुसकर उनपर चाय फेंका था..हमने छात्रों और शिक्षकों को बहुत करीब से देखा. शुक्रिया नरेन, आपके और संस्थान के खिंचतान में हमें आसपास मौजूद लोगों को पहचानने में मदद मिल रही है. सतर्क हुए जा रहे हैं.
पॉलिटिकल साइंस ने हमें दलाली नहीं सिखाई. हमें बराबरी के साथ जीना, न्याय सुनिश्चित करवाना, हक के लिए आवाज उठाना सिखाया. हम बस्तर, कश्मीर, दांतेवाड़ा, मराठवाड़ा के लोगों से भी वन-टू-वन नहीं कर पाते, इसका मतलब हमें उनके जल-जंगल-जमीन के संघर्ष पर बोलना ही नहीं चाहिए? शुक्रिया आईआईएमसी लाइब्रेरी, तुमने हमें क्राइम रिपोर्टिंग ऑब्जेक्टिवीटी और हाशिये पर गये लोगों की पत्रकारिता का अंतर स्पष्ट करवा दिया.
हमने अपने शिक्षक को हमेशा मेंटर माना. डीयू के प्रोफेसर से पहला धक्का तब लगा जब उसने मेरी जाति पूछी. जब शिक्षक को प्रिंसिपल का पैर छूते देखा, पर्मानेंट वालों का एडहॉक के साथ दुर्व्यवहार हमें अंदर तक परेशान कर दिया करता. शिक्षक का प्रोमेशन के लिए क्लास में लॉबिंग करना हमें एकेडमिया का एक अलग स्तर दिखाता है. चुंकि, मैं पहले कभी मीडिया का स्टूडेंट रहा नहीं इसलिए जब शिक्षक ने कहा सिर्फ़ काबिलियत से कुछ नहीं होगा, कॉन्टैक्ट बढ़ाइए तभी नौकरी मिलेगी..दिमाग हिल गया.
सेमिनार में पहुंचकर सरकारी वक्ताओं के साथ लुडुक-भुड़भुड़ी वाली आदत रही ही नहीं. उनके नंबर-ईमेल-एफबी पर कभी दुआ सलाम कर उन्हें अपना नाम याद नहीं करवाया. क्लास हमें लेफ्टिस्ट/दलित चिंतक/नारीवादी फ्रेम करती रही है. बुद्धिजिवी शब्द का उग्रता से प्रयोग होने लगा है...लेकिन, हम हुलुक-बानर नहीं जो 'ऑल ओके' ना होने पर भी फेसबुक पर 'ऑल ओके' लिखकर अपनी तटस्थता साबित करने में लग जाये.
छात्र कैंटीन में, हॉस्टल में मिलकर कुछ कहते हैं और सार्वजनिक तौर पर एकदम पलटी. कुछ छात्र, छात्र नहीं बचे. वो डीजी का बामा हाथ हो गये. वैसे, पलटी खेल में शिक्षक कम थोड़ी हैं. खुद के साथियों पर हो रहे अत्याचार पर भी खामोश. उनका कोई पक्ष नहीं है. उनको डर है कहीं स्टैंड लेने के चक्कर में कल उनका नंबर ना लग जाये. डियर सर/मैडम, जब हिप्पोक्रेट ही होना है फिर इथिक्स और मीडिया संगठन स्वामित्व के लेक्चर मत दिया कीजिए. वैसे, याद रखिएगा ऐसे ही आपकी फ्रेमिंग होगी और अलग होने पर आपके गले तलवार लटक आएगी. बाकि, क्लास में आकर कह दीजिए टंकण ही जिंदगी है. यही मानकर काम चला लेंगे. पत्रकार नहीं टाइप राइटर हैंं!
नरेन प्रकरण में पत्रकारिता के छात्र अनिश्चित भविष्य को लेकर कतई चिंतित नहीं दिखते. 2010-16 (पांच साल लगभग) तक के अकेडमिक एसोसिएट को 22,000 रूपये की कच्ची नौकरी, एडहॉकिज़्म...आपका दैनिक जागरण टू अमर उजाला में क्या होगा ये भी सोच लीजिएगा. बिना नोटिस बाहर फेंक दिये जाने पर आपके साथ कौन खड़ा होगा..या आपको ऐसी नौबत ही नहीं आये. पत्रकार के मौत पर पत्रकारिता जगत एकजुट क्यों नहीं होता, इसका छोटा उदाहरण यहाँ से भी समझा जा सकता है.
नरेन के साथ छात्रों का स्वेच्छा से खुलकर आना ही उस शिक्षक की उपलब्धि है. उसे फेसबुक/ व्हाट्सएप्प स्क्रीनशॉट और प्लेसमेंट का हूल नहीं देना पड़ रहा है. सलाम है उन छात्रों को जिन्होंने हक की आवाज उठाई है. जिनके सोशल मीडिया पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है फिर भी लिखे जा रहे हैं. 'फेसबुक क्रांतिकारी' कहकर जलील करने की कोशिशें की जा रही है. ना फेसबुक से अबतक कोई क्रांतिकारी बना है ना ही क्रांतिकारी शब्द कोई गाली है. लेकिन, मानना पड़ेगा लिखने से आप पर दबाव तो बनता है. ये लड़के एक आंदोलनकारी के तौर पर नाकामयाब हो सकते है लेकिन ज़मीर से मरे तो नहीं हैं..
अगर मैं नरेन होता, ऐसे संस्थान में वापस आने की नहीं सोचता. कारण बताओ और जस्टिफाई कर दो, मैंं विदा लेता हूँ. मेरा मानना है, संस्थान के ब्रांड से कुछ नहीं होता, हमसे संस्थान की ब्रांडिंग होती है. आईआईएमसी से हम नहीं, हमसे आईआईएमसी है. पत्रकारिता संस्थान में हिंदी पत्ररकारिता की 52-55 सीटों पर चार से ज्यादा लिस्ट आने लगी है, क्यों? क्यों नहीं लेते एडमिशन? ब्रांडिंग में कमी है या कंटेंट में? खैर,
स्क्रीनशॉट्स और कलर प्रिंट आउट्स की जगह बचाइए. डिजिटल इंडिया में योगदान हेतु ब्लॉगर का लिंक ही यूज कर लीजिएगा. शुक्रिया आईआईएमसी, पत्रकारिता संस्थान के क्लासरूम और एडमिनट्रेशन में ही Transparency/ Autonomous/ Free/ Diverse Opinions/ Spiral of Silence/ Manufacturing Consent/ Propaganda आदि शब्दों की थ्योरैटिक्ल और प्रैक्टिक्ल यूज़ समझने लगा. थैंक्यू.
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