डियर संजय लीला भंसाली, सस्पेंशन के बाद हमने आलोचना लिखना छोड़ दिया है

डियर संजय लीला भंसाली

संजय, सस्पेंशन के बाद हमने आलोचना लिखना छोड़ दिया है. बस, इतना ही कहूंगा जो हुआ बुरा हुआ है. नहीं होना चाहिए था. सारे भले कमाने-खाने वाले मानस की तरह हमें भी खेद है. बाकि बहुत काम है हमको. फालतू के झंझट में नहीं पड़ेगें.

मालूम हुआ आपके साथ इस वक्त बॉलिवुड भी खड़ा नहीं हो रहा. हमारे केस में भी बिरादरी के कुछ लोग ही स्टैंड ले पाये थे. वैसे, आपका केस भी ऑब्जेक्टिविटी से जुड़ा है. आपने करनी सेना वालों से नहीं पूछा उनकी पद्मावत कैसी थी. इससे राजस्थान की छवि malign हुई है. खैर मनाइए, रानी पद्ममीनी जिंदा नहीं है वरना defamation का चार्ज लगता. वहाँ का प्रशासन बहुत सहिष्णु है. आपको राजस्थान से debarr नहीं किया गया. करनी सेना ने सिर्फ खिंचतान कर नोटिस दिया है.

अब इतिहासकारों की कमिटी बैठेगी. उसमें लेफ्ट/राईट/सेंटर सबके पक्ष रखे जाएं. उसके बाद आपका पक्ष लिया जाएगा. फिर आपको एक undertaking देना होगा - 'मैं संजय लीला भंसाली करनी सेना के कोड ऑफ कंडक्ट का उल्लंघन नहीं करूंगा.' मजेदार होगा कि आपको बताया ही नहीं जाएगा आखिर क्या उल्लंघन कर दिया जो अंडरटेकिंग दें. आप ये पूछ सकते हैं- भला, करनी सेना हमें क्यों और कैसे कोड ऑफ कंडक्ट देगी? जबाव नहीं मिलेगा. चुंकि, वो लठ्ठबाज हैं प्रशासन हैं इसलिए उनकी चमड़ी मोटी है. उनकी शब्दावली अलग है. अंडरटेकिंग के बाद आप आराम से शूटिंग कीजिए. हो ही सकता है फिल्म रिलिज तक सरकार बदल जाये.

पता लगा ही होगा इतिहासकार इरफान हबीब ने प्रो.गौरी शंकर ओझा का रेफरेंस देते हुए ट्विट किया है कि रानी पद्ममनी 1540 ई० तक कोई कैरेक्टर नहीं थी. मलिक मोहम्मद जयसी की रचना 'पद्ममीनी' ने पद्ममीनी नामक फिक्शनल चरित्र का निर्माण किया. खैर,

मेरी मानो, कुछ दिनों तक मीडिया/सोशल मीडिया से दूर रहो. करनी सेना वालों से मिलकर बात सुलझा लीजिए. बेवजह के बवाल से राजस्थान के इतिहास की बदनामी हो रही है. शाहरूख गया न राज ठाकरे के पास, कोई दिक्कत हुई उसे? माहिरा है न सिनेमा में? आप तो ये वाला खेल समझते ही हैं. देवदास से बाजीराव बड़ा सेट, बड़ा कारनामा. वैसे, बाजीराव में गज़ब का ठगे थे. ठग ही लिये तो क्या हुआ नेशनल अवार्ड तो मिला!

इस इमोशनल क्राइसिस में थोड़ा अकेला महसूस करेंगें आप. पर उम्मीद मत करना कि अमिताभ बच्चन कुछ कहेंगें. हमने भी पढ़ाने वालों से उम्मीद की थी. सब चुप रहे. कमाते-खाते रहे. कोई क्रांतिकारी नहीं दिखना चाहता न! नज़रों में आ जाएगा. इन बातों से थोड़ा दुख होगा. हिप्पोक्रेसी लगेगी. फिर यथार्थ समझकर संभल जाओगे. शाहरूख पहले ही बता चुका है Meryl Streep की तरह भारत में बोलना मुश्किल है.

एक ठो बात बताइए, आप कला/फिल्मों/कलाकारों पर लगातार हो रहे हमलों पर कुछ स्टैंड लिये थे? तब आप कमा-खा रहे थे. आज वो कमा रहे हैं. So chill. सब ठीक हो जाएगा. बोलने वाले, साथ खड़े होने वाले यही कुछ क्रांतिकारी टाइप के सोशल मीडिया यूजर्स होंगे. कमाना-खाना जारी रहेगा. कुछ ऑब्जेक्टिव होंगें जिन्हें ना रानी पद्ममनी पता होगी ना ही करनी सेना. क्या ही बोले! क्या ही साथ दे!

वैसे, ऐसे लोगों का नहीं बोलना ट्रोल करने वालों से बेहतर है.
Anyways, Take Care.

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