"चुर्की मास्टर की साइकिल चोरी" - दीपांकर

- दीपांकर
ये उस दौर की बात है, जब 21वीं शाताब्दी नई-नई शुरू हुई थी. पुराने लोग पुराने रह गए थे और हम जैसे 20वीं सदी के अंत में पैदा हुए लोग तेजी से बदलते हुए सीख भी रहे थे,बौरा भी रहे थे.
उस वक्त हम बच्चा लोग किसी बड़े के हाथ में मोबाइल देखते ही ,पाजामे का नाड़ा और बहती नाक छोड़ ,उसे निहारने लगते थे. और ये वो दौर था जब मिडिल स्कूल के मास्टर ज्यादातर टुटही साइकिल से ही चलते थे.
ये कहानी हमारे मिडिलिया दोस्त दीपू तिवारी की है, और काहे की हमारा नाम मिलता-जुलता था, तो उन्होंने जैसा बचपने में जिया था, वैसा ही मुझे सुनाया और सत्यनारायण कथा की तरह, वैसे ही मैं आपको बताता हूं, पढ़िए और पढ़ने के बाद हमारा नहीं अपना दिमाग मथिए, और हां पढ़ने के बाद ये मत पूछना कि अब दीपू तिवारी कहां हैं? काहे कि अब वह कहीं और उपन्यास बनाने में लगे हैं.
ये कहानी आपका सच भी हो सकती है या दीपू तिवारी और उनकी कहानी की तरह कल्पना भी.
हमारे (मने दीपू तिवारी के) बाप श्री रामचरन तिवारी, जो एक तरह से बीएड, एलएलबी थे, प्राइमरी में मास्टर थे, और उनके स्कूल बदलते (ट्रांसफर होते) रहते थे. उनके स्कूल बदलते ही हमारा स्कूल भी बदल जाता था. इस तरह पहली कक्षा से सातवीं तक हम भी तीन-चार स्कूल बदल चुके थे. हमारे पिताजी प्राइमरी में पढ़ाते थे, तो वो सिर्फ कक्षा पांच तक ही हमें अपने स्कूल में पढ़ाने का सौभाग्य पा सके.
लेकिन, इससे दुखी होकर कभी भी उन्होंने मेरा नाम प्राइवेट स्कूल में नहीं लिखवाया. उनका यकीन था कि प्राइवेट स्कूलों में नए-नए लौंडे पढ़ाने के लिए जाते हैं, जो 400-500 रुपए लेकर बेगारी करते हैं. जो युवा मास्टर अपना भविष्य नहीं देख पाते, वो मेरे बेटे को तो चरणामृत बांटने लाय़क भी नहीं बना पाएंगे.
इस तरह मेरा दाखिला प्राइमरी के बाद सरकारी मिडिल स्कूल में हो ही गया.
मिडिल स्कूल क्या था, पूरा गांव था. बगल में नहर बहती थी, जिसकी धारा में हम स्कूल के लौंडे पहले तो ढेला-पत्थर मारकर लहर पैदा करते थे, फिर कुछ ज्ञानी होने पर मूत के उसकी धारा बढ़ाने लगे. इस प्राकृतिक प्रक्रिया को जब भी कोई खलिहर मास्टर देख लेता, तो गुरु-शिष्य के बीच कुम्हार-घड़े वाले वैदिक नियम के कारण हम लाल चूतड़ लेकर घर आते.
स्कूल के दूसरे किनारे पर गांव वालों की भैंसें बंधती थीं और उसी के बगल में बच्चों को साफ-सफाई सिखाने के उद्देश्य से स्कूल में शौचालय कम मूत्रालय ‘बालकों हेतु’ बना दिया गया था. बालिका शौचालय तीसरे कोने पर था. स्कूल के लौंडे मूत्रालय में मूतने कम, गांव वालों की भैंस खूंटे से खोल देने के लिए ज्यादा जाते थे, जिससे स्कूल में हंगामा मच जाए और पठन-पाठन के न होने वाले कार्य से थोड़ी देर के लिए राहत मिले, और उस बीच वो नहर की धार से अपनी मूत्र-धार का मुकाबला कर सकें.
इस तरह हम लौंडों का वक्त, कक्षा की टाट-पट्टी पर कम, नहर के किनारे झूठे-टट्टी करने में ज्यादा बीतता था. इससे आगे की प्रक्रिया में जो एक बार सौंचते-सौंचते नहर में गिरता, वो फिर तैरना सीख कर ही बाहर आता था.
लेकिन, मेरे साथ ऐसा न हुआ. मैं बाप के चंगुल से नया-नया छूटा था और अन्य बालकों की भांति मेरा अनुभव नहीं था. मैंने चटक बनने की कोशिश में एक छंलाग लगा कर नहर पार करने का बयाना ले लिया. शर्त लच्छी खिलाने की थी. मैंने शोएब अख्तर वाली स्टाइल में रनिंग शुरू की. बच्चों ने शोर करना शुरू किया. नहर के किनारे पर दौड़ते-दौड़ते मैं ये सोच रहा था कि कूदूं या नहीं. और नहीं पार कर पाऊंगा सोचकर भी मैंने छलांग लगा दी. एक पैर गीली मिट्टी पर पड़ा. दूसरा पानी में और मैं सरक कर पानी में बहने लगा. फिर डूबने लगा. पहले मुझे अपने भीगे कपड़े की याद आई. फिर मम्मी की. फिर पापा के थप्पड़ की. और तब तक हाथ-पैर मारते हुए मैं तीन-चार घूंट पानी पी चुका था.
इतने में मेरी बांह किसी ने पकड़ी और खींचकर बाहर निकाला. ये करिया था. करिया का असली नाम अरविंद प्रसाद था, लेकिन लोग उसके काले रंग और ऊपर से दलित होने के कारण करिया ही कहते थे. उसने अपना नाम करिया ही मान भी लिया था.
उसने हाथ खींचकर बाहर निकालते हुए मुझसे कहा, ‘‘शुक्र करो दीपू तिवारी. हम मूतने आए थे. नहीं तो तुम भगवान को प्यारे हो गए होते.’’
ये वही करिया थे, जो एक बार हमारी चप्पल पहन लिए थे, तो हमने उनसे लड़ाई कर ली थी.
लेकिन, अब उन्होंने मेरी जान बचाई थी, तो हमने उनसे कहा कि तुम्हीं हमारे सबसे अच्छे दोस्त हो.
उसके बाद हम और करिया सचमुच सबसे अच्छे दोस्त बन गए.
वक्त गुजरा और कक्षा छह-सात पास होने के साथ-साथ हमने करिया के साथ नहर में तैरना भी सीख लिया.
कक्षा आठ में पहुंचते ही हमारा सामना पूर्व माध्यमिक विद्यालय कादीपुर यानी हमारे विद्यालय के नए किंतु बूढ़े हो चुके प्रधानाचार्य पंडित राधेश्याम से हुआ. पंडित राधेश्याम को देखते ही बच्चे लाइन से खड़े हो जाते थे. शोर करते हुए बच्चे चुप हो जाते थे और भैंसें बों-बों की आवाज नहीं करती थीं. वो जब जोर से किसी बच्चे को डाँटते थे तो दूर मूत्रालय में मूत रहे बच्चे का पेशाब बंद हो जाता था,नहर में मूत रहा बच्चा नहर में कूद कर डुबकी लगा लेता था और डाँट खाने वाले बच्चे की पैंट गीली हो जाती थी.
पंडित जी रिटायर होने की उम्र में प्रधानाचार्य बने और रिटायर हो जाने से पहले बच्चों को कूट-काटकर लाइन पर लाकर बुढ़ापा उसे याद करते हुए बिताना चाहते थे.
वो एक लंबी चोटी रखते थे, इसलिए बच्चों ने उन्हें गुरूजी कहने से पहले पंडित जी कहना शुरू किया. फिर उनके पीठ पीछे चुर्की गुरूजी कहने लगे.
पंडित राधेश्याम (चुर्की गुरूजी) ने आते ही बच्चों का नहर पर हगना-मूतना मुहाल कर दिया.
अब जितनी लंबी लाइन नल पर पानी पीने वाले बच्चों की लगती थी, उतनी ही लंबी लाइन शौचालय पर मूतने वालों की. और क्योंकि बच्चों के मूतने की धारा का शोर भैंसों के मूतने के आगे दब जाता, इसलिए बच्चे कम्पटीशन में बार-बार मूतने जाने लगे.
एक दिन पंडित जी कक्षा छह के एक बच्चे को जोर-जोर से मारने लगे. बाकी कक्षाओं के बच्चे उनके डर से अपनी कक्षाओं से ही लाइव आनंद ले रहे थे. किसी की हिम्मत क्लोजअप से देखने की नहीं थी. चुर्की गुरूजी चिल्ला रहे थे, ‘‘तुम सारे शूद्र-चमार के लौंडे… आता-जाता कुछ नहीं है. विद्वान बनने चले आते हो. वेदों में सही लिखा है. शूद्रों को शिक्षा नहीं शोभती. ब्राह्मण का काम तुम करोगे? कलेक्टरी तुम करोगे, तो क्या ब्राह्मण भीख मांगेगा. कलियुग में शूद्र भी ब्राह्मण बनने लगेंगे, ऐसा लिखा भी है और तुम कर भी वही रहे हो. कक्षा पांच कहां से कैसे पास हुए? हमारे जमाने में कक्षा पांच तहसीलदार बन जाते थे और तुम हो साले, क से कमंडल भी नहीं पता है.’’
चुर्की गुरूजी का ये रूप देखकर मैं अंदर से हिल गया. ब्राह्मण परिवार में मैं भी पैदा हुआ था, लेकिन शूद्र की परिभाषा अब समझ में आई थी.
मैं सोचने लगा कि अगर ब्राह्मण श्रेष्ठ होता है, तो उस दिन नहर में डूबते हुए मुझे करिया ने कैसे बचा लिया था. उसे तो लोग चमार कहते हैं.
इस घटना के बाद मैं खुद में काफी उलझ गया था. तभी एक और घटना घटी, जिसने चुर्की गुरूजी के अनुशासन को मेरे लिए नफरत में बदल दिया.
चुर्की गुरूजी के आने से पहले स्कूल की साफ-सफाई सभी लोग मिल-जुलकर करते, लेकिन उन्होंने साफ-सफाई के लिए टीम बना दी. आपको याद दिला दें, ये वो दौर था, जब स्कूल में सफाईकर्मी तो दूर की बात है, अध्यापक भी पूरे नहीं होते थे. अध्यापक तो स्कूलों में अब भी पूरे नहीं हैं, लेकिन सफाईकर्मी हो गए हैं.
लेकिन पंडितजी ने जो टीम बनाई थी, वो हमें एक महीने बाद समझ में आई. ब्लैकबोर्ड साफ करने और चॉक लगाने का काम ब्राह्मण-क्षत्रियों का था. मैदान में झाड़ू यादव, कुर्मी आदि लगाते थे और शौचालय साफ करने का काम दलितों को सौंप दिया गया था.
एक दिन जब करिया चॉक लाने चला गया, तो पंडितजी ने मुझे मेरी जिम्मेदारी याद दिलाई और कहा कि आगे से ऐसी भूल अक्षम्य होगी.
अब मैं धर्म और दोस्ती के बीच की उलझन में फंसा था. मेरा खुद को कभी-कभी बड़ा मान लेने का मन करता था, लेकिन स्वीकार नहीं कर पाता था. मैंने पंडितजी की बात पिताजी को बताई. उन्होंने मुझसे कहा, ‘‘अनंत काल से ब्राह्मण को श्रेष्ठ माना गया है. पंडितजी सीनियर अध्यापक हैं, वो तुम्हें ठीक ही पढ़ाएंगे.’’
पंडितजी हमें हिंदी और संस्कृत पढ़ाते थे. वो अच्छा पढ़ाते थे, लेकिन उनके सवाल पूछने पर जब कोई दलित बच्चा जवाब दे देता, तो हमसे कहते कि सीखो इससे, जबकि किसी ब्राह्मण बच्चे के जवाब देने पर वो कहते, ‘‘शाबास’’.
कक्षा आठ बीतता जा रहा था. और करीब-करीब हमारी ही नजर में बुरे बन चुके प्रिंसिपल (प्रधानाचार्य) के अंडर हम लोग पढ़ रहे थे, जो अनुशासित था, बुरा था और जातिवादी था.
उत्तर प्रदेश में ‘जाति नहीं जाती’, अगर ऐसा कहा जाता है, तो ये भी जान लीजिए वहां त्योहार और मेले भी कभी खत्म नहीं होते.
उस दिन हम कक्षाओं को समाप्त करके रोज की तरह भारी मन से घर जाने वाले थे, तभी करिया ने कहा कि आज मेला है, देखने चलेगा? मैंने कहा कि दस रुपए हैं जेब में. उसने कहा, ‘‘मेरे पास चालीस हैं.’’ तो मेला देखना तय हुआ. स्कूल वाला बस्ता, कक्षा के टांड़ पर फेंका गया, वहीं हम अपनी बैठने वाली बोरियां भी फेंकते थे .
नहर वाला रास्ता पकड़ कर हम आगे बढ़े, तो पीली-पीली, लाल-लाल साड़ी पहनकर जाती अनगिनत औरतें, नील-चढ़ी बनियान पहने हुए बुजुर्ग, जो साइकिल चला रहे थे ,या साइकिल उन्हें चला रही थी, पता नहीं चला … जाते दिखे.
इन सब पर धूल उड़ाती बैलगाड़ियां, उस पर सोते कारीगर, बैलगाड़ी से बचते लोग, नहर में गिरते लोग, बैलगाड़ियों की धूल से माहौल मैलाई हो गया था. इसे मेलाई भी कह सकते हैं. ये सब इसलिए, क्योंकि मेले के उस पार की मलाई सबको नजर आ रही थी.
इसी बीच जनेऊ कान पर चढ़ा कर नहर में मूतते चुर्की गुरूजी दिखे. करिया ने उनकी मूत्र-धार देखते हुए उन्हें प्रणाम किया. पंडितजी जल्दी से जनेऊ उतारकर बोले, खुश रहो करिया. मुझे देखकर उन्हें उनका स्वच्छता-ज्ञान याद आ गया.
हम सब आगे बढ़े तो काली माई का चौरा दिखाई दिया, जिसके चबूतरे पर लगे पत्थर को देखकर करिया ने मुझसे उसे पढ़ने को कहा और मेरा संस्कृत-ज्ञान,पंडित ज्ञान दम तोड़ गया. लिखा था : ‘‘महिषासुरमर्दिनी ज्ञानम् वृक्ष, संवत 1642.’’ यहीं से हमने मेला देखना भी शुरू किया.
तब तक चुर्की गुरूजी अपनी नई साइकिल से घंटी बजाते हुए हमें पार कर गए. साइकिल एकदम नई थी. बैलगाड़ी से पड़ गई थोड़ी धूल छोड़ दें, तो चमचमा रही थी.
हम आगे बढ़े तो चाय और मिठाई की दुकान पर सबसे ज्यादा भीड़ दिखी और सबको पता था कि मिठाइयों में खोए की जगह घुइयां,कांद और आलू-चावल का आटा मिला है. फिर भी लोग भकोसने में लगे थे. दुकानदारों ने भी कसम खाई थी कि दाम चाहे कम ही मिले, लेकिन मिलावट के बिना कोई चीज बनाए और बेंचे वो दम न लेंगे.
औरतें आलूचाट खा रही थीं और नाक-आंख-मुंह, सबसे पानी चुआ रही थीं. तभी चुर्की गुरूजी मिठाई खरीदते दिखाई दिए. वो मिठाई की दुकान पर थे, लेकिन खरीद जलेबी रहे थे. हमें देखते ही वो शरमा गए.
हम और आगे बढ़े तो आल्हा की भीड़ और शोर सुनाई देने लगा. आल्हा वाले गायक एक-दूसरे की आवाज को बहुत ऊंचाई पर काट रहे थे और भीड़ का शोर उन सबको काट रहा था, हारमोनियम वाला आल्हा राग में भी नागिन बजा रहा था, और गायकों का मुँह साँप के फन की तरह फूल गया था . हमें वो रोमांचक नहीं लगा और हमने पाया कि हम, नेताजी के मंच की तरफ आ गए हैं. नेताजी का भाषण चल रहा था और वो बता रहे थे कि कैसे उन्होंने मेले को पुनर्जीवित कर दिया. वो बता रहे थे ”मेले में ठेले पहले से ज्यादा बढ़ गए हैं. उम्मीद है कि भीड़ जैसे यहां आई है, वैसे ही उन्हें वोट भी देगी”. आदि आदि. जिंदाबाद जिंदाबाद. आदि आदि…. इत्यादि .
तब तक नेताजी ने चुर्की मास्टर को देख लिया था, क्योंकि चुर्की मास्टर बच्चों को पढ़ाते थे और बच्चे भविष्य का वोट होते हैं. इसलिए नेताजी इस मौके पर चूके नहीं और उन्होंने चुर्की मास्टर को मंच पर आमंत्रित किया. चुर्की मास्टर नई साइकिल और उसमें बंधी गरम जलेबी को छोड़ कर मंच पर जाना नहीं चाहते थे, लेकिन तालियों के बीच उन्हें जाना पड़ा. नेताजी ने उनके पैर छुए, बदले में चुर्की मास्टर ने नेताजी के पैर छुए. इस तरह अभिवादन संपन्न हुआ.
चुर्की मास्टर को स्टेज थमा दिया गया. उन्होंने कहा, ‘‘इस देश को उन्होंने शिक्षित करने का कार्य किया है. मेले में कितने दुकानदार होंगे, जिन्होंने उनसे पढ़ा होगा”. भीड़ ने ताली बजाई, ”लेकिन ये लोग मिलावटी सामान बेचते हैं. जलेबी तो आप कभी खा नहीं सकते, उलटी हो जाएगी”. भीड़ ने फिर ताली बजाई. इस तरह वो जलेबी वालों पर अपना गुस्सा निकाल रहे थे. आगे उन्होंने कहा, ‘‘छोटी जातियों के लोग यहां मिठाई बना कर सबका धर्म भ्रष्ट कर रहे हैं, मैं तो इनकी जलेबी कभी नहीं खरीदता.’’
नेताजी ने आगे से उच्च वर्ग के जलेबीवाले का स्टॉल लगाने का वादा किया और हाथ जोड़ कर माफी मांगी. चुर्की मास्टर ने आगे कहा कि इस देश को वो शिक्षित बना कर रहेंगे.
तब तक मेले में आया एक आदमी चुर्की मास्टर की साइकिल पर बैठ कर उन्हीं की जलेबी खा रहा था. चुर्की मास्टर ने उसे स्टेज से घूरा, लेकिन कुछ बोल नहीं पाए. आदमी ने आधी जलेबी अपने आस-पास वालों को खिलाई, फिर आधी जलेबी दोबारा साइकिल में टांग कर साइकिल लेकर जाने लगा.
चुर्की गुरूजी दांत पीस रहे थे. नेताजी उन्हें आश्वासन दे रहे थे कि अगली बार से मनपसंद जलेबी का स्टॉल होगा.
चोर साइकिल लेकर जा रहा था. चुर्की मास्टर देख कर भी कुछ नहीं बोल पा रहे थे.”
(ये कहानी लल्लनटॉप कहानी लेखन प्रतियोगिता की विजेता रही है. सबसे पहले इसे लल्लनटॉप पर प्रकाशित किया गया था. यहाँ लिंक दिया है- "http://www.thelallantop.com/bherant/lallantop-kahani-competition-prize-winner-story-churki-master-ki-cycle-chori-by-deepankar/)
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