'खोल दो हॉस्टल की हुक' - बीएचयू की 'बदचलन' लड़कियों के नाम एक विद्रोही गीत
तुम कोई कैदी नहीं हो
न मुकदमा न गवाही
न अदालत न ही कोई फैसला
फिर क्यों तुम्हें
अपराधियों के भांति करके बंद
लगाकर चौकसी ऊंचे दीवारों की
तुम्हारे हॉस्टल के गेट पर
लटका दिया है
लेट एंट्री का कोई थुलथुला ताला
तुम्हारे ख्वाबों के आकाश में
चमकने वाले ग्रह-नक्षत्रों को
तुम्हारे चन्द्रमा को
बताकर अपहरणकर्ता
छत की चादर से तुम्हें महफूज आखिर कर दिया है
तो क्या बस इसलिए कि पास तेरे
सिनेमा से अखबार तक
सबमें दिखने वाली अप्सराओं की तरह
उनमुक्त केश
मादक नयन
सुर्ख अधर
उभरे उरोज
लचकती कमर
प्रमत्त चाल
से बनी एक देह हैं
या बस इसलिए कि पास तेरे
सोने चांदी की बालियां, कंगन, खनकती चुड़ियाँ हैं
या कि शायद इसलिए कि पास तुमने
कपास के खेतों से निकली
रूई के फाहों से निर्मित
श्वेत सैनेटरी पैड, ब्रा ब्लॉउज
जैसा रहस्यमयी पोशाक रखा है
तो फिर तुम छोड़ क्यों नहीं देती
निकल क्यों नहीं जाती
चुड़ियों के वृत से
पोशाकों के चित्र से
स्त्री के चरित्र से
क्यों नहीं किसी दिन
अपनी महिला संरक्षक के समक्ष
तोड़कर चूड़ियां करती विधवा विलाप
उड़ा देती हवा में लहुलुहान सफेद कबूतर
खोल देती हॉस्टल के सारे हुक
और दिवारों के सीनों पर लिख देती
अपने वक्ष का माप
आखिर देश भी 56 इंच के सीने से चला करता है।
(आशुतोष बीएचयू के पूर्व छात्र रहे हैं। साथ ही भारतीय जनसंचार संस्थान से हिंदी पत्रकारिता में दक्षता हासिल की है। अभी महात्मा गांधी फेलोशीप के अंतगर्त अहमदाबाद, गुजरात, विषय समाजकार्य में शोधार्थी हैं। रंगमंच और कविताएं लिखने का शौक़ है। इनकी कविताएं में जनसरोकर, राजनीतिक कटाक्ष और विद्रोही स्वर होते हैं।)
नोट- आशुतोष उर्फ़ आर्य की इस कविता को 'बोलता हिंदुस्तान' नाम के वेब पॉर्टल ने प्रकाशित किया था। ब्लॉगर पर इसे कवि के संज्ञान में प्रकाशित किया जा रहा है।




So apt.. hard hitting.. and yet poetic!
ReplyDeleteकसी हुई मगर प्रवाह युक्त
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