ओ! मई 2019, नफरत की हवा बदल दो


मुझे 2019 मई का इंतजार है. लोकसभा चुनाव से बहुत उम्मीदें हैं. हां, राजनीतिक उम्मीदें ही हैं क्योंकि शायद पहली बार राजनीति ने घर-परिवार के भीतर दीवार खड़ी कर दी है. निजी जीवन प्रभावित हो चुका है. ऐसा नहीं है कि मुझे  कांग्रेस या किसी विपक्ष से  बहुत ज्यादा उम्मीदें हैं. बतौर पत्रकार जिम्मेदारी सत्ता से सवाल करने की है. वह बताने की है जो वे छिपाना चाहते हैं. पर आज मैं क्या हम सब एक ऐसे मुहाने पर खड़े हैं जहां हमारे रिश्ते नफरत की राजनीति से प्रभावित हैं. चाहकर भी मैं उसे अनदेखा नहीं कर पाता. परिवारों और रिश्तों के बीच राजनीति ने नफरत बो दी गई है. ये भाजपा-संघ की फेक/फॉल्स न्यूज़ पर सवार आक्रमक राजनीति का नतीजा है. मैं उसका पीड़ित हूं.

मैं अपनी नानी वापस चाहता हूँ. मामा वापस चाहता हूं. चचेरे/मौसेरे भाई वापस चाहता हूं. चूंकि मैं सवाल करता हूं, वो मुझे कम्युनिस्ट समझते हैं. उनके लिए कम्युनिस्ट होने का मतलब देशद्रोही होना होता है. कभी वे मुझे मैं प्रो-कांग्रेस, कभी प्रो-केजरी कहते हैं. वे मुझे हर उस खांचे में डालते हैं, जो भाजपा और संघ  के एजेंडे के खिलाफ है.

2013-14 के साल में मामा, मौसी, चचेरे-फुफेरे भाई सब 'हिंदू' बन गए. उन्होंने अपनी पढ़ाई-लिखाई पर यकीन खो दिया. एक वक्त मुझे बहुत गुमान था, मेरे मामा एमएससी फिजिक्स हैं, मौसी पीएचडी हैं, हमारे घर में टीचर/प्रोफेसर हैं, वकील हैं. मुझे लगता था पढ़ा-लिखा व्यक्ति तार्किक और समझदार होता है. वह अपने विवेक से दुनिया को खूबसूरत बनाता है. लेकिन 2014 ने सब पलट दिया.

दादा नेहरू की कहानियां सुनाते थे. 1922 में गया में कांग्रेस अधिवेशन के किस्से सुनाते थे. बताते थे कैसे उन्होंने कांग्रेसी कार्यकर्ता रहते हुए अधिवेशन की तैयारी की थी. महात्मा गांधी ने दादा को नाम से बुलाया था, यह किस्सा सुनाते हुए वह भावुक हो जाया करते. दादी पलकिया, शेरघाटी की कहानियां सुनाती थी, जब गांव में ईद-दिवाली साथ मनाते थे. नाना इलेक्ट्रिक ग्रिड और गांव में बिजली लाने के किस्से बताते हुए नेहरू का विजन बताया करते. बेगूसराय से होने के कारण उन्होंने बरौनी रिफाइनरी की स्थापना बहुत करीब से देखी थी. वह दक्षिणेश्वर  काली की पूजा करते थे. नवरात्र अष्टमी को बलि दी जाती थी. घर की रिपेयरिंग का काम खुर्शीद मिस्त्री ही किया करते. घर पर खाया-पिया, सो जाया करते. कभी महसूस भी नहीं होता, वह किसी दूसरे धर्म से हैं.

आज उन्हीं घरों में गांधी-नेहरू को अभद्र भाषा से संबोधित किया जाता है. दूसरे धर्मों को लेकर इतनी नफरत कि आपको उनमें पोटेंशियल क्रिमिनल/दंगा करने वाले नज़र आने लगे. वे बकरीद की फेक तस्वीरें शेयर करते हैं. बताने की कोशिश करते हैं कि मुसलमान ज़ालीम होते हैं. नव वर्ष को ईसाई परंपरा से जोड़ने लगे. विपक्षी नेताओं के लिए सरेआम फेसबुक पर अभद्र टिप्पणियां करते हैं. नानी अब फोन नहीं करती. शुरुआत में इसे फील नहीं किया करता. खुद ही उन्हें फोन लगाकर शिकायत किया करता, "आप तो फोन ही नहीं करतीं अब."  वह तुरंत कहतीं, "तुम्हारा नंबर ही नहीं है." मैं फोन पर समझ पाता हूं कि नानी को उधर से कोई सिखा कर रहा है. नंबर नहीं होने का बहाना एक बार किया जा सकता था, फुर्सत न हो पाने का बहाना दो बार किया जा सकता था पर हर बार  बहानों की डोर पर रिश्ते नहीं बंधते. जबकि मुझे मालूम है नानी बाकी सबसे फोन पर बात करती हैं. मामा फोन लगाकर देते हैं. बस मेरा फोन नहीं लगता, नंबर नहीं होता, फुर्सत नहीं होती या वह फोन करने का सोच ही रही होती कि इत्तेफाक से मैं फोन कर दिया करता!

नानी-दादीघर की कुछ स्मृतियां मेरे भीतर इतनी गहरी धंसी हैं कि मैं उन्हें दोबारा जीना चाहते हैं. अकेले में भावुक होकर शांत बैठ जाता हूं. मैंने अपने सिरे से कोशिश भी की. लेकिन मैं उनसे कैसे बात करूं, जब वे मॉब लिंचिंग का उत्कर्ष मनाते हो.

फिर मैं खुद ही खुद को नॉस्टैलजिया पीड़ित इंसान घोषित कर लेता हूं. लेकिन नहीं उबर पाता. मैं सच में रिश्तेदारों के जुटान में बैठकर इतराना चाहता हूं. सबके साथ बैठकर गप मारना चाहता हूं. ठठाकर हंसना चाहता हूं. इसीलिए मुझे उम्मीद है मई 2019 से.

आज स्थिति ऐसी है कि मैं यह भी नहीं लिख पा रहा कि, मुझे यकीन है वे मुझे फिर से इज़्जत दें. सशंकित रहता हूं कि वे दंगाईयों की तरह अपने भांजे से नहीं उलझा करेंगे. मुझे नहीं चाहिए कि वे मुझे मोहब्बत करें. बस, बेटे के विचार/विचारधारा में अंतर के कारण उसके मां-बाप से नफरत तो न करें. मेरी लिए वो मामा, मौसी और मौसा हैं. मां तो अपने भाई-बहन से दूर हो रही है न.

उन घरों में छोटे-छोटे बच्चे हैं, उनकी परवरिश उसी माहौल हो रही है. चौदह साल का लड़का तलवार लहराता राम नवमी के जुलूस में शामिल होने लगा है. मैं उसे समझाने की कोशिश करता हूूं कि यह सही नहीं है. पर वह धर्म समझने के पहले ही धर्मरक्षक की भूमिका अख्तियार कर चूका है. उसकी मां उसे मुझसे मिलने और बात करने की अनुमति नहीं देती. मैंने जिस मौसेरे भाई के साथ बचपन बिताया है, वह राजनीतिक प्रौपोगैंडा के कारण मुझसे दूर है. रिश्तों की वेदना को कौन समझेगा. मैं थर्ड क्लास राजनीति के आगे अपना परिवार नहीं खोना चाहता. इसीलिए मुझे नये साल से बहुत उम्मीदें हैं. 

मई 2019, नफरत की ये हवा बदल दो.





Comments

  1. आपका दुःख मुझे अंदर तक झिंझोड़ गया। मुझे तो यक़ीन नहीं हो रहा! नानी मौसी भाई जैसे रिश्ते आप जैसी सुलझी बातें और प्रेम प्यार से बात रखने वाले से बिगड़ गए। मेरी दुआ है कि 2019 मई के चुनाव परिणाम बिल्कुल इस तरह आएं कि आपके अपने आपके विवेक के क़ायल हो जाएं और कुछ ही दिन बाद आपसे स्वयं प्रगतिशील तर्कों पर पर खुले दिल से जुड़ने लगें

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