डियर कॉमरेड्स,
आपका सस्पेंशन बिल्कुल गलत और अलोकतांत्रिक है. कई पूर्व छात्र इससे विचलित हैं. वे आपके साथ हैं. फीस के मुद्दे पर भी वे आपके साथ रहे हैं. बीते दो-तीन दिनों में आईआईएमसी को लेकर बहुत कुछ घटा है. एक-दूसरे पर खूब क्रॉस फायरिंग हुई है. उसमें घायल छात्रों का एजेंडा हुआ है. फीस हाइक के प्राथमिक एजेंडे में शराब और सिगरेट जैसे हावी हो गया. शराब-सिगरेट पर खूब सारी बात हो रही है. मोरल पुलिसिंग टाइप.
मेरे ख्याल में छात्रों का धरना शराबबंदी के खिलाफ नहीं था. फीस हाइक, शिक्षा सबके लिए एजेंडा था. जिसके साथ मैं भी रहा हूँ. अभी भी हूं पर थोड़े से गार्ड्स के साथ. निजी हमलों के बाद सतर्क हो गया हूं. उन हमलों का आपलोगों को समर्थन करते देख थोड़ा दुख हुआ. ईमका का दलाल कहे जाने पर बुरा लगा. आपको भी मेरा अवार्ड लेना बुरा लगा होगा. अपने-अपने पक्ष होंगे. एक बात बताइए- एक दलाल आपको पत्र लिख रहा है? और, आप पढ़े जा रहे हैं!
एक रिपोर्टर की प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वह अच्छी स्टोरी करता रहे. बिना किसी अवार्ड की चिंता किए. यह एक आदर्श स्थिति है. लेकिन इस इंडस्ट्री की कटु सच्चाई है कि पत्रकारों को तरह-तरह की स्वीकृतियां लेने की जरूरत महसूस होती है. कोई एक स्थापित ब्रांड में नौकरी करना चाहता है. कोई कैरियर के शुरूआती वर्षों में चुपचाप रहकर काम करना चाहता है और कुछ बदलने की इच्छा में डिजिशन मेकिंग बॉडी में जगह खोजता है. हमारे लेखक साथी दैनिक जागरण के मंचों से फेक न्यूज़ पर वक्तव्य दिए आते हैं. देश में पत्रकारिता के भी अवार्ड देने के लिए नेताओं को आमंत्रित किया जाता है. अरूण जेटली, चिदंबरम, कोविंद, प्रणब किसके हाथों अवार्ड नहीं बांटे गए? नौकरी की अनिश्चतिततओं के कारण लोग आंदोलनों से खुद को काट लेते हैं. भय संस्थान के गलीच हरकतों से होता है जैसे आपके सोशल मीडिया कि मोनिटरिंग (रिट्विट्स आर नॉट इंडोर्समेंट), प्रोमोशन और एप्रेशल में दिक्कतें आदि. ये बहुत ही प्रैक्टिक्ल समस्याएं हैं. जिसे हमसब अपने-अपने तरीके से डील करते हैं.
मैं समझता हूँ कि आंदोलन लोगों को साथ लेकर चलने से बनता है. सबके पॉलिटिक्स में थोड़ा-बहुत फर्क होगा, आज या कल, लेकिन एक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम होता है जिसपर सब एक होते हैं. यह खत्म हो चुका है. जरूरत है कि लोगों को आप मॉब्लाइज़ करें. प्रशासन पर प्रेशर बनाने की रणनीति बनाई जाए. फिलहाल ये होता नहीं दिखता. या आपलोग कोशिश कर ही रहे होंगे.
मैं बिना फीस का वकील बनते हुए सलाह दे रहा हूँ कि आपलोग एक ट्विटर स्ट्रॉम करें. जहां दो-तीन मुख्य रिसिवर हो- मंत्रालय, डीजी और आईआईएमसी. उससे आप मीडिया को भी अपनी तरफ खींचने में सफल हो सकते हैं. दूसरा कि छात्रों और पूर्व छात्रों का ग्रुप डीजी और एडीजी से मुलाकात करे. डेडलॉक को खत्म करने की कोशिश हो. फीस हाइक का मुद्दा भी पूर्व छात्र ही मंजिल तक पहुंचा सकते हैं. आपने उनको उचित माहौल तैयार करके दिया है. ध्यान रहे कि इमका के बिना भी छात्रों के एक बड़े समूह ने फीस हाइक को लेकर मंत्रालय को पत्र लिखा था.
वैसे एक बात मैं समझ नहीं सका या मेरी समझ गड़बड़ा गई होगी अवार्ड लेकर. छात्रों का धरना दिसंबर के आखिरी सप्ताह में खत्म हुआ. ठीक उसके पहले एक्ज़ीक्यूटिव काउंसिल का गठन किया प्रशासन ने. इमका ने शायद प्रसाद सान्याल को आपका प्रतिनिधि बना दिया. आपने उसका स्वागत भी किया. जनवरी पहले वीक में एक्जीक्यूटिव काउंसिल की मीटिंग हुई. मीटिंग में छात्रों का कोई प्रतिनिधि नहीं था. जो कि एक मांग भी थी. मीटिंग के नोट्स मिले मीटिंग के दस दिन बाद. स्कॉलरशिप की संख्या बढ़ा दी गई थी उसमें. आपलोग खामोश रहें. इमका के अलावा जिन लोगों ने प्रशासन को पत्र लिखा उन्हें कुछ भी कॉम्युनिकेट नहीं किया गया. वे ठहरे मूर्ख. अचानक से एलुमनी मीट में कुछ घंटे बाकी रहे और व्हाट्सएप पर फ्लैश हुआ कि कल अफॉर्डेबल एजुकेशन पर टॉक है. मतलब, इतना इंस्टैंट टॉक? जाहिर था कि वो एक रणनीति थी. आंदोलन ऐसे मोंमेट्स के जरिये अपने मैसेज को एम्पलीफाय करते हैं. पर्चा बांटकर आपने बहुत अच्छी कोशिश की. धीरे-धीरे सारा नैरेटिव इमका से किराया लो. शराब, सिगरेट, नाच-गाना, अवार्ड की तरफ नैरेटिव शिफ्ट किया गया. कॉम्युनिकेशन छितराने लगा. ऐसा लगा कि इमका के लोगों से बदला लेने का एजेंडा किसी दूसरे तरफ के इमका सरीखे गुट का एजेंडा रहा. आपके कंधे पर बंदूक रखकर फायर कर दिया. खैर,
मेरी पॉलिटिक्स पर आप एक सप्ताह बाद खिखिया लेते तो अच्छा रहता. मैं भी अपने वरिष्ठों के पॉलिटिक्स को खूब समझता हूँ. एक तरफ चढ़ाते भी रहना. दूसरे तरफ खुलकर साथ भी नहीं देना. वो उनकी पॉलिटिक्स है. तरह-तरह की अनिश्चितताओं से बनती है. फिलहाल साथी एजेंडे पर टिके रहिए. सस्पेंशन रिवॉक किया जाना सबसे जरूरी है. फी हाइक को लेकर संघर्ष बड़ा है. मुझे तो लगता है कि आने वाले वर्षों में संस्थान के प्रशासक भी सरकार के खिलाफ धरने पर बैठ जाएंगें. बजट सत्र में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करेंगे. कहेंगे हमारे संस्थान का बजट बढ़ाओ. पक्की नौकरियों के लिए हमारे साथी कॉलेजों में एडहॉक कर रहे हैं. प्राइवेट कंपनियों में खट रहे हैं. पूंजीवादी व्यवस्था की आलोचना के बाद भी हमारे लीविंग स्टैंडर्ड को बाज़ार ही तय कर रहा है. हम बस इतना ही कर पाते हैं कि खपत को नियंत्रित कर लें. नज़र घुमाकर देखिए कि नौकरी करने वाले चुपचाप नौकरी कर ही रहे हैं न. उनकी अपनी पॉलिटिक्स है. अपने लिए खुद ही एक दायरा बनाते हैं.
जो लोग आपके आंदोलन में न तीन में, न तेरह में शामिल रहे, वे भी मज़ा ले रहे हैं. अद्भुत है..एक टेस्ट आप कर लीजिए पहचानने के लिए ही सही. आपको मालूम होगा कि कितने लाइनों पर पर हम साथ हैं, कितने लाइनों पर अलग. दांत निपोरनों को बोलिए कि रोहिण को छोड़िए. आप आइए न महोदय, लीड लीजिए.
शुक्रिया आपने मेरी जवाबदेही तय की. वरना लोग क्या-क्या नहीं कर लेते, कोई पूछने तक नहीं जाता. दिल से शुक्रिया.
रोहिण कुमार
12.02.2020
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