ख़ुद का शुक्र-गुज़ार हूं कि मुसलमानों के प्रति कटुता की भावना लिए नहीं मरूंगा
- दीपक कुमार
हमारे बाप-दादाओं की कई पीढ़ी मुसलमानों के प्रति कटुता की भावना लिए स्वर्ग सिधारे चली गई . ज़िंदा रहते हुए उन्होंने कभी नहीं सोचा कि वो आख़िर मुसलमानों से नफ़रत क्यों करते हैं. मुझे भी बचपन से सिखाया गया कि 'मलेच्छों' के घर का चाय नहीं पीते. खाना तो हर्गिज नहीं. जब पड़ोसी मुस्लिम घर से ईद की सेवई आती तो मां मुझे न देकर खुद ही खाती. कहती कि न जाने क्या मिलाया हो, तुमलोग नहीं ही खाओ. यह जब सबकुछ हो रहा था तो मेरे घरवाले आरएसएस और बीजेपी वालों को नहीं जानते थे.
यकीन मानिए मेरी मां ने तो बीजेपी और आरएसएस का नाम 2014 के बाद ही सुना था. वो भी मेरे मुंह से. 2014 के चुनाव में वो मोदी को वोट दे रही थी. बीजेपी को नहीं. दादा-दादी जो 20 साल पहले मर गए उनकी भी स्थिति वैसी ही थी. 1992 में बाबरी विध्वंस को लेकर उनकी कोई समझ नहीं थी. 1992 के पहले और बाद में उनकी व्यावहारिक स्थिति में कोई खास परिवर्तन नहीं था. मुसलमानों के प्रति एक जड़ सोच थी कि वे इस देश के नहीं है. यकीन है कि उनसे पहले की पीढ़ी भी इसी जड़ सोच के साथ ज़िंदगी काटकर मर गई होगी. मुसलमानों के प्रति सोच और इस सोच पर आधारित धार्मिक रेखाएं बहुत पहले खिंची गईं थी.
बचपन में मैं काफ़ी अक्ख़ड़ था. रेंगते जीव जंतुओं को मारने में बहुत मन लगता था. पर मैं कभी गिरगिट को नहीं मारता था. मुझे बताया गया था कि गिरगिट हिंदू हैं. इसके पीछे एक कहानी बताया गयी थी. एक बार दंगा हुआ था तो मुसलमान कुआं में छिप गए. फिर मुसलमान मकड़ी ऊपर से अपने जालों का छाता लगाकर उन्हें बचाने की कोशिश में लग गई. लेकिन गिरगिट ही उस समय उस जाले को काटकर हिंदुओं को बताया कि मलेच्छ तो इस कुआं में छिपे हैं. जब से मैंने ये कहानी सुनी थी तब से गिरगिट को माफ़ कर देता, पर मकड़ी जहां दिखती, उसे दुश्मन समझकर चांप देता. हिंदू-मुसलमान का यह स्याह सच हमारे लोक-कथाओं में बसा है. इसके लिए किसी सड़क छाप मैगजिन पढ़ने की जरूरत नहीं थी. न किसी संगठन की शाखा मे जाकर इसकी ट्रेनिंग लेने की.
मैंने सबकुछ इसी समाज से सीखा. इस अंधज्ञान को खुद से कभी चैलेंज नहीं कर पाया. न स्कूल में ही इसको चैलेंज करने के लिए उतना ज्ञान पा सका. ग्रेजुएशन में जाकर सेक्युलरिज्म का परिभाषा समझ सका. क्योंकि 2014 तक किसी मुसलमान से दो मिनट बात नहीं हुई थी. कोई मुसलमान दोस्त ही नहीं बना था. मेरे सर्किल में कोई मुसलमान नहीं था. ग्रेजुएशन में जाने के बाद यह बात समझ आई कि जिस समाज से मैं दो मिनट भी नहीं मिला, उसके बारे में मेरी समझ इतनी उल्टी-पुलटी कैसे हो गई. मैं इस भीड़ में अकेला नहीं था. मेरे कई भाई थे. रिश्तेदार थे. परिचित थे. गांव-ज्वार वाले थे. जो कभी मुसलमान से बात नहीं कर पाए. बाद में मेरे कई मुसलमान दोस्त बने, जो अभी तक हैं. इनसे पता चला कि मैं कितना ग़लत सोच रहा था. ऐसे दोस्तों से मुझे अलग रखकर मेरा समाज कितना बुज़दिल था. मैं अब सूकुन से मर सकता हूं कि मुसलमानों को लेकर मेरी कटुता खत्म हो गई.
मैं अपने प्रिय हिंदू भाई-बहनों को भी कहूंगा कि आप भी मुसलमानों से एक बार मिलिए. वो आपसे अलग बिल्कुल नहीं है. दो मिनट मिलिए तो. चाय नहीं पीजिएगा. बात तो किया ही जा सकता है. एक बार सोचिए कि आपको किस बात का नफ़रत है. मुसलमानों से ही पूछ लीजिए कि मैं ऐसा सोच रहा हूं, बताओ न कि तुम ऐसे क्यों हो. मुझे यकीन है कि आपकी गलतफहमी दूर हो जाएगी.
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