दिल्ली का दंगल

               केजरीवाल बनाम बेदी
                           -रोहिण कुमार

दिल्ली में चुनावी बिगुल बज चुका और महीनों से चली आ रही राजनितीक दलों की नूरा-कुश्ती और भी तेज होती जा रही है। चाय की चौपाल हो या आरडब्लूए की साप्ताहिक मिटींग हो हर जगह चर्चें चुनावी ही हैं। बसों में,कॉलेजों में, आॉफिसों में 'भक्तों' से मिलना मुश्किल नहीं है। मौसम ठंड का है तो लिबास में राजनीति शमा गयी है। मफ्लर पहनने वाला केजरीवाल के खेमे का फौजी है तो हॉफ-कोट पहने हुए की पहचान मोदी के राहगीर के रूप में की जा सकती है क्योंकि दिल्ली के विभीन्न बस स्टैंडों पर, मेट्रो में  'चलो चले मोदी के साथ' के नारों ने फिजां गर्म कर रखी है और हर यात्री कम से कम यह नारा तो एक बार जरुर मन में बोल ही देता है।
      चुनावों के तारिख घोषित होने के पहले भाजपा प्रवक्ता एक सुर में गाते थे-"हम मोदीजी के नेतृत्व में चुनाव लडेंगे। भाजपा मुख्यमंत्री पद की घोषणा चुनावों से पहले नहीं करेगी।ये हमारी रणनीति का हिस्सा है और हमने महाराष्ट्र,हरियाणा,झारखंड,जम्मू-कश्मीर में कामयाबी भी पायी है।" इस सुरमयी माहौल को 16जनवरी,2015 ने एक नई  दिशा प्रदान कर दी। किरन बेदी भाजपा में शामिल हुई। उनके शामिल होने के तुरंत बाद से ये कयास लगाने जाने लगे की भाजपा का मुख्यमंत्री उम्मीदवार किरण ही होंगी और 19/01/2015 को हुई संसदीय बोर्ड की बैठक ने इसपर मुहर लगा दी।

यहाँ समझने की जरुरत यह है कि भाजपा को दिल्ली में मुख्यमंत्री उम्मीदवार क्यों घोषित करना पडा,बीते विधानसभा चुनावों में तो मोदी के चेहरे को ही भुनाते थे? इसके प्रमुखयत: दो कारण रहें होगे-पहला,दिल्ली में पदस्थ सरकार के खिलाफ रोष नहीं (एंटी-इनकंबेंसी नही है) है हालांकि 'आप' और 'कांग्रेस' जनता के बीच केंद्र के शासन का जिक्र करती रही है। दूसरा,अरविंद केजरीवाल के बेदाग छवि के मुकाबले भाजपा के पास कोई नेता नहीं था इसलिए भाजपा ने पूर्व साथी को अपने ही साथी से लडवाना का फैसला किया। किरण बेदी के आने से चुनावी गणित थोडा जरुर बदला है पर फिल्हाल इसका फायदा भाजपा को मिलता बिल्कुल नहीं दिखता।

किरण बेदी ने भले ही भगवा चोला पहन लिया हो पर कई सवाल अभी भी अनुत्तरित ही हैं। कभी भाजपा-कांग्रेस के चुनावी खर्चों को पारदर्शी और सूचना के अधिकार के अंदर लाने की मांग करने वाली बेदी आज उसी ब्रिगेड की नेता बन चुकीं हैं। यह उनकी प्रतिबद्धता और अनुशासनात्मक छवि पर एक गंभीर सवाल खडा करता है। बेदी प्रेसिडेंसियल डिबेट की भी पक्षधर रहीं हैं पर भाजपा में आने के बाद शायद  अब 'विचार परिवर्तन' हो गया है।

कुछ सवाल अरविंद केजरीवाल पर भी खडे होते हैं। दिल्ली के लिए सशक्त जनलोकपाल बिल की मांग करने वाले केजरीवाल ने इसे ही मुद्दा बनाकर मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दिया था पर आज यह मुद्दा इनके बैनरों,पोस्टरों में मुखर होता नहीं दिख रहा है। शायद लोकसभा चुनावों के दौरान मिथ्या प्रचार इसका अहम कारण रहा होगा। अरविंद के इस्तीफे और बनारस से चुनाव लडने पर विरोधी खेमे ने उन्हें 'दिल्ली छोड कर भागने वाले' की उपाधी दे डाली और इसे इतना प्रचारित किया गया मानो केजरीवाल ने गलती नहीं कोई जगण्य अपराध किया हो। अरविंद के इस्तीफे ने उन्हें राजनीति का खलनायक बना दिया और जनता दुखी और गुस्से में थी। अगर दिल्ली चुनावों में भी जनलोकपाल मुखर होता मुद्दा दिखता तो विरोधी दल जनता को अरविंद का इस्तीफा याद दिलाते और यकीन दिलाते की अगर फिर से जनलोकपाल बिल पास नहीं होगा तो अरविंद इस्तीफा दे देंगे। अरविंद इस्तीफे के लिए जनता के बीच जा-जाकर माफी मांगते रहें हैं जो शायद ही आज कोई राजनेता करता है।

अरविंद और किरण दोनों की छवि बेदाग रही है और दोनों प्रशासनिक कौशल में निपुण हैं। दोनों ने अन्ना के जनलोकपाल आंदोलन में साथ काम  किया है और एक दूसरे को बखूबी जानते समझतें हैं। करीब साल भर पहले 28 दिसंबर,2013 लोकपाल एवं लोकायुक्त बिल संसद से पास हो चुका है, 1जनवरी,2014 को राष्ट्रपति की मुहर लग कानून भी बन चुका है पर आजतक इसकी नियुक्ति नहीं हुई है। इस देश में अबतक नेता विपक्ष नहीं चुना गया है और ना ही सिवीसी के चैयरमैन की नियुक्ति हुई है। देश के दो अहम महत्वपूर्ण पद रिक्त हैं जो लोकायुक्त और लोकपाल की नियुक्ति में अहम भूमिका निभाएंगे। क्या किरण बेदी से इसका जबाब नहीं  मिलना चाहिए?

किरण बेदी को भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने के बाद से भाजपा समर्थक उत्साहित हैं, इस चुनाव केजरीवाल बनाम किरन बनाने की कोशिश चल रही है। इसके उलट भाजपा के अंतर अंतर्कलह की खबरें भी हैं जिसका उदाहरण मनोज तिवारी,जगदीश मुखी के ताजा बयान हैं भले ही बाद में दोनों ने इसपर सफाई दे दी हो। सतीश उपाध्याय (अध्यक्ष),भाजपा उपाध्यक्ष शिखा राय,भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष नकुल भारद्वाज, पूर्व विधायक जय भगवान अग्रवाल,धीर सिंह बिधूडी  के समर्थक खुलकर बेदी का विरोध करते दिखे हैं। सतीश उपाध्याय और गजदीश मुखी तो मुख्यमंत्री के रेस में माने जा रहे थे। मुखी को तो 'आप' ने उम्मीदवार घोषित कर प्रचार भी कर दिया था। खैर,ये तो समय बताएगा,यह भीतरघात किसको लाभ या हानी पहुंचाएगा।

अरविंद और किरण का समान्यत: सामाजिक जीवन एक सा ही रहा है। आज दोनों राजनीति में हैं और एक दूसरे के खिलाफ खडें हैं तो कुछ सवाल हैं जिनपर अब दोनों को ध्यान में रखकर सोचने की जरुरत है।
1.अरविंद का अन्ना से अलग राह पकडना अगर अवसरवादिता थी तब तो आज किरन ने भाजपा से जुडकर अरविंद के फैसले को परोक्ष रुप से सही साबित कर दिया है। अन्ना का मानना था-'राजनीति किचड है,इसमें जाओगे तो तुम भी गंदे होगे'। वही अरविंद का मानना था-'अगर राजनीति को साफ करना है तो इस किचडनुमा  राजनिती में घुसना ही पडेगा।' उस वक्त नेताओं ने भी ललकारा था-'कानून सडकों पर नहीं बनते,संसद में बनते हैं।' इस चुनौती को स्वीकार कर अरविंद ने राजनीति में आने का ऐलान किया और 'आम आदमी पार्टी' बनाई। तब से शुरू हुआ अरविंद को अवसरवादी बताने का खेल। किरण ने तब अन्ना को अरविंद के साथ मंच साझा करने से मना किया और अन्ना का साथ दिया। जनलोकपाल के दूसरे आंदोलन के वक्त दिल्ली में अरविंद मुख्यमंत्री बन चुके थे। मिडीया से हवाले से अन्ना ने संदेश दिया कि अरविंद चाहे तो आंदोलन में आ सकते हैं पर उन्हें मंच के बजाय दर्शक-दीर्घा में बैठना होगा। अरविंद व्यस्तता के कारण जा तो नहीं पाए पर उन्होंने गोपाल राय को भेजा। वीके सिंह जो अन्ना के साथ मंच साझा कर रहे थे उनकी गोपाल राय से बहस हुई और राय को अन्ना ने वापस जाने का आदेश दिया। वीके सिंह ने लोकसभा चुनावों के दरमियान भाजपा की सदस्यता ग्रहण की और आज मंत्री हैं,आज तकरीबन दस महीने बाद किरण बेदी भी भाजपा से जुड चुकीं हैं। इन दोनों ने राजनिती में आने के पहले अन्ना से सलाह मश्वरा भी नहीं किया यहाँ तक की उन्हें सूचित भी नहीं किया। फिर ऐसे में अरविंद के अन्ना को धोखा देने एंव उनके मंच का प्रयोग करने के आरोप निहायती बेबुनियाद लगता हैं।

2. अरविंद आज भी जनलोकपाल को लेकर प्रतिबद्ध दिखते हैं,उनकी पार्टी चंदे एवं चुनावी खर्चे का पूरा हिसाब देती है अर्थात अरविंद आज भी अन्ना के सपनों को पूरा करने के लिए प्रयासरत हैं वहीं बेदी एक ऐसी पार्टी से जुड चुकि हैं जो अन्ना के दोनों सपनों को चूर करती है।

3.कुछ लोग मानतें हैं अरविंद के पास राजनैतिक अनुभव की कमी है,वो एक कुशल प्रशासक तो हैं पर कुशल राजनेता नहीं। इसपर भी किरण अरविंद से पीछे दिखतीं हैं। किरन को राजनीति मे आए जुम्मा-जुम्मा चार दिन हुए हैं। महज भाजपा से जुडने भर से ही वो कुशल प्रशासक से राजनेता बन जाएंगी,ये उपयुक्त समझदारी नहीं लगती।

4.इसमें कोई दोमत नहीं कि भाजपा के पास कार्यकर्ताओं और एक मजबूत संगठन है। वही 'आप' एक नई पार्टी है। पर सवाल यहाँ यह है-'क्या किरण बेदी मजबूत संगठन से जुडकर सिर्फ चुनाव जीतना चाहतीं हैं या अपने आदर्शों,सिद्धातों के लिए भी प्रयत्नशील हैं?' किरन के भाजपा से जुडने के बाद कुछ लोगों को लगा कि किरण भाजपा को सुधार देंगी। यह शायद उनकी एक चाल हो,मानो भाजपा के भीतर घुस भाजपा को सुधारना चाहती हो। जैसे अरविंद किचड साफ करने कीचड में उतरें हैं। पर हालिया उनके करतब ने निराश किया है। उन्होंने लाला लाजपत राय की प्रतिमा को भाजपा का मफ्लर पहना ये साबित कर दिया की किरन अब भाजपा के रंग में ढल चुकि हैं बजाय कि भाजपा किरन के रंग में।

5. इस चुनाव में चेहरों ने मुद्दों की जगह ले ली है। दिल्ली को एक ऐसा नेता चाहिए जो दिल्ली की समस्याओं को जानता,समझता हो। उन समस्याओं पर विमर्श करने वाला हो। इस कडी में अरविंद का किरण को बहस के लिए निमंत्रण एक बहुत अच्छी पहल है। चुनावों के पहले बहस लोकतंत्र को गौरवान्वित करने का एक मौका होगा। बीते 65 वर्षों से तो हमने संसद में ही बहस होते देखे हैं। जब  गैर-राजनैतिक परिदृश्य से आने वाले दो इमानदार लोग,जिन्हें हमेशा राजनिती और व्यवस्था सुधारने की जरुरत महसूस हुई है,आज राजनीति में हैं तो क्यों ना मुद्दों पर बहस कर स्वच्छ राजनीति की दिशा में कदम बढाया जाए? दिल्ली देश की राजधानी है, बावजूद यहां बिजली,पानी,सडक,शिक्षा,रोजगार,स्वास्थ्य आदी प्रमुख मुद्दे हैं तो इसका मतलब साफ है कुछ न कुछ गंभीर बीमारी जरुर है इस राजनैतिक व्यवस्था में। ये मुद्दे अबतक के हर चुनाव और पार्टीयों के घोषणापत्र में रहें है पर समस्या आज भी बनी हुई है। विधानसभा में बहुत बहस हुई पर अब बहस चुनावों से पहले जनता के बीच हो। इससे जनता को भी उम्मीदवार चुनने में सहूलियत होगी।

किरण बेदी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करना आम आदमी पार्टी की जीत है। अच्छे लोगों की राजनीति में जरुरत है और दिल्ली का मुकाबला अच्छे,ईमानदार, आशावादी लोग जो स्वच्छ, ईमानदार राजनीति कि परिकल्पना करतें है उनके लिए एक प्रेरणा है।

बहरहाल,कुछ भी हो। यह लडाई हर दिन एक नया मोड ले रही है। जनता सारे तिकडम देख,समझ रही है। कोई अरविंद को मुख्यमंत्री बनते देख रहा है तो कोई बेदी के रुप में दिल्ली का 'किरण' देख रहा है। वहीं ये लडाई किरण बनाम अरविंद बनने से कांग्रेस परेशान है। कांग्रेस बस एक ही उम्मीद में है,दोनों की बयानबाजी से परेशान हो जनता कांग्रेस को एक और मौका दे देगी। कांग्रेस का यह आशावादी रवैया सराहनीय है वरना दिल्ली के ताजा परिस्थितियों में कांग्रेस का सीधा मुकाबला 'बसपा' से होता दिख रहा है।

समर्थक उत्साह से लबरेज हैं। पर सारे दलों के समर्थकों को ध्यान रहे राजनीति में हमले वैचारिक होने चाहिए निजी नहीं। हालिया रामलीला मैदान में प्रधानमंत्री का बयान भी अशोभनीय था। राजनिती में सुचिता बनाई रखें एवं अपने मत का प्रयोग अवश्य करें।

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