एक भेदभाव ऐसा भी
फुल्लें बनाम पॉपकोर्न
(लोहडी पर विशेष)
-रोहिण कुमार
दिल्ली विश्वविद्यालय
लोहडी के दिन की शुरुआत लोहरी की बधाईयों से हुई। दिनभर लोहडी की शुभकामनाओं का सिलसिला चलता रहा। कॉलेज से लौटते हुए अपने कमरे पर जा ही रहा था कि मेरे मित्र सुरेंद्र ने मुझे पकड लिया। दरअसल,सुरेंद्र शाम के शाम मोमो की स्टॉल लगाते हैं और मैं उनका परमानेंट ग्राहक हूं इसलिए बडे हक से मुझसे बतियाते हैं और मैं भी उन्हें कभी निराश नहीं करता।
लोहडी होने की वजह से सडक के दोनों ओर फुल्ले,मूंगफली,गुडपट्टी,तिल आदि की अस्थायी दुकानें लगी थी। इफ्तेफाक से सुरेंद्र भाई के मोमो स्टॉल के साथ में ही एक लोहरी के साम्रगी की भी दुकान लगी थी। सुरेंद्र से उनके घर का हाल-चाल पूछा,थोडी बातें राजनिती पर भी हो गई , कुछ समय में सुरेंद्र अपने ग्राहकों में व्यस्त हो गए और मैं साथ की सीढीयों पर बैठ गया।
मैं दोनों दुकानों पर आते-जाते लोगों को देख रहा था। तभी लोहरी वाली दुकान पर एक लडकी आई और दुकानदार से पूछा-"भईया,पॉपकोर्न कैसे दिए?" दुकानदार ने उसकी ओर देखा और कहा- "मैडेम,पॉपकोर्न दिए 180 के किलो।" लडकी ने बिना कोई तोलमोल किए दुकानदार को बोली- "भईया,आधी किलो कर दो।" पैसे थमाएं और चली गयी।
मैं सबकुछ देख रहा था और अंचभित था। दुकानदार वही पॉपकोर्न सबों को 120 कि कीलो बेच रहा था पर उस लडकी को वही पॉपकोर्न 180 के भाव बेचा। सुरेंद्र से विदा लेते हुए मैं उस दुकानदार के पास गया और कहा-"भईया,फुल्ले कैसे दिए?" दुकानदार-"120/किलो।" "और पॉपकोर्न कैसे दिए?"-मैंने पूछा। दुकानदार मुस्कुराते हुए-"यार,मजे मत लो। अभी दुकानदारी का समय है।" मैने कहा-"अरे,मैं कहां तुम्हारा समय खराब कर रहा हूं? मैंने तो सिर्फ दाम ही पूछा है। तुमने उस लडकी को यही फुल्ले 180 का बेच दिया और मुझे 120 बता रहे हो,ऐसे कैसे?" दुकानदार (थोडा झल्लाते हुए)-"सुनो,लडकी पॉपकोर्न मांग रही थी,फुल्ले नहीं।"
"मैं भी तो यही मांग रहा हूं"-मैंने कहा। दुकानदार-"तुमने फुल्ले मांगे हैं।" मैनें कहा-"चाहे फुल्ले कहूं या पॉपकोर्न,बात तो एक ही है।यार,गजब हो तुम! एप्पल कहूं या सेब कहूं दोगे तो सेब ही!" दुकानदार-"भई देख,तूने समय तो खोटी कर ही दी है,अब सुन भी ले। जब फुल्ले ऐसे खुल्ले मिलें तो वो पॉपकोर्न नहीं हैं। यही फुल्ले अगर सिनेमाघर में मिलें तो पॉपकोर्न हो जातें हैं और दाम यहाँ के फुल्ले से तीन-चार गुणा ज्यादा और तौल भी कम। यहाँ एक दिन का बाजार होता है और उसमें भी लोग भाव में तोल-मोल करवातें हैं पर सिनेमाघरों में तो 100 रुपए लेते भी हैं फिर भी एक छोटी थैली पकडा देतें है,वहाँ कोई कुछ सवाल नहीं करता। और तू जो कह रहा है न,एप्पल-सेब वाली बात,तो सुनले,सेब खाने वाले की इज्जत नहीं होती जेब में 'एप्पल'(आईफोन) है तो लोग सलाम ठोकतें हैं,लडकियां दोस्ती करती हैं।समझा!! अब जा यहाँ से।"
मैं वहाँ से निकल तो जरुर गया पर दुकानदार की बातों ने मन में कई सवाल खडे कर दिए। तभी मुझे 'फुल्ले' और 'पॉपकोर्न' के बीच के बीच पनपते द्वेष का अंदाजा लगा। हिंदी-अंग्रेजी के बीच बढती खाई और अंग्रेजी से बदलती सामाजिक हैसियत का भी अनुमान लगा। चिजों की मार्केटिंग का महत्व भी समझ आया। दुकानदार ने उस लडकी के साथ अन्याय तो जरूर किया ,इसमें कोई संदेह नहीं है पर दुकानदार की मन:स्थिती भी समझनी जरुरी है।
यह तो सिर्फ एक उदाहरण है,न जाने ऐसी कितनी चिजों में मार्केट आज हावी है। यह उदाहरण गरीबों के दोहन की एक लघुकथा है।
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