बजट चकल्लस

         आम आदमी का 'खास' बजट।
(उच्च वर्ग खातिर मालदा, मध्यम वर्ग खातिर लंगडा और गरीब खातिर गुठली)

टींग टींग टींग...12826 झारखंड संपर्क क्रांति एक्सप्रेस जो नई दिल्ली से चलकर रांची जंक्शन तक जाएगी एक नंबर प्लेटफार्म पर खडी है। यात्रियों से अनुरोध है कि वे अपना अपना स्थान ग्रहण करें।।
     S6 में 31,32 है हमलोगों का। सीट दो लोगों की रिजर्व है पर उसपर यात्री है कुल पांच। 'अरे ट्रोली नीचे डाल दो, छोटा वाला बैग ऊपर रख दो।' सहपाठिन (साथ में सहयात्री) ऋषिका बोलीं। ट्रेन खुल गई पर अभी भी लोगों ने अपने अपने बर्थ पर स्थान ग्रहण नहीं किया था। घंटो बीते,तस्वीर जस की तस। मालूम चला, सभी के पास रिजर्वेशन टिकेट है पर सीट कंफर्म नहीं है। दो सिटों के बीच की जगह,शौचालय,गेट के इर्ध-गिर्द अखबार बिछा कर यात्रियों ने अपना बैठने का ठिकाना बनाया। तस्वीर दुर्लभ थी। कुछ यात्री सामान्य डब्बे वाले भी थे। जेनरल टिकट लेकर शयनयान कक्ष में विराजमान थे। गाडी में पानी नहीं, शौचालय गंदगी का अंबार, पंखों की दुर्दशा, कोच में गंदगी ये कुछ तस्वीर है भारतीय रेल की जिसकी जबावदेही सिर्फ रेलवे की बल्कि हमारी भी है। लब्बोलबाब में कहे तो सहूलियत कम और मजबूरी ज्यादा है यात्रियों के साथ।

यह तस्वीरें बयां है रेल बजट के कुछ दिनों बाद की। यह सही है की रेल बजट के तुरंत बाद कोई चमत्कार नहीं हो सकता पर हां,अगर बजट इस तस्वीर की समस्या नहीं समझ पाया तो समाधान निकालना लगभग नामुमकिन ही है। बजट में नई  गाडियों की घोषणा न हुई हो या किराया ना बढा हो, यह बहुत बडी बात नहीं है। दरअसल, बजट आय-व्यय का ब्यौरा होता है जिसमें भविष्य की नितियों का भी उल्लेख होता है।

      रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने तो रेल के कायापलट की उद्धोषणा कर दी है। उन्होंने होने वाले खर्चे का तो जिक्र किया है पर खर्चने को इतनी 'लक्ष्मी' कहां से लाएंगे, ये तो प्रभु ही जाने। पांच साल में 8.5 लाख करोड के निवेश का खाका है। अब तो फैशन जिसे जरुरत माना जाता है वो है 'निवेश', उम्मीद है इसी से बदलेगा वेश। रेल बजट पर मेरी सहपाठीन ने जबरदस्त खिल्ली उडाई। कहा- 'बजट हर साल देना है, पर मंत्री एक ही बजट में ही पांचो साल का उल्लेख करते हैं।' मतलब सरकार के कार्यकाल के दौरान चार बजट सत्र होंगे और हर बजट सत्र में अगले पांच वर्षों की योजना रहेगी अर्थात मोटे तौर पर हम 20 वर्ष आगे की भारतीय रेलवे की कल्पना करते हैं।' किसी भी बजट में यह क्यों नहीं बताया जाता है कि वार्षिक लक्ष्य क्या है? इस वजह से बजट का वास्तविक समाकलन कर पाना मुश्किल होता है। दूरदर्शी होना सही है ,क्योंकि रेलवे की हालत से हर व्यक्ति वाकिफ है इसलिए ऐसे ख्याल लाजमी भी हैं।

     भले ही भारत में पीपीपी मॉडल कभी कारगर साबित नहीं हुआ है पर फिर भी  रेलवे में पब्लिक प्राइवेट पार्टनर पर जोर है। भाजपा ने परंपरा अनुरुप कांग्रेस को नेता विपक्ष का पद नहीं दिया पर पीपीपी की असफलता परंपरा के आडे नही आती। बोलो सारा रा रा!! वाह खिलाडी वाह!!

माल भाडे में भी 10% तक की वृद्धि की गई है जिससे जरुरत की वस्तुओं के दाम बढना तय हैं। बजट में नेटवर्क के विस्तार से लेकर बुलैट ट्रेन तक है। 9 रेल गलियारों में ट्रेन की गति 200 किमि/घंटा तक बढाए जाएंगे, मानवरहित क्रांसिंग खत्म करने की भी योजना है, रिजर्वेशन टिकट अब चार महीने पहले भी बुक किए जा सकते हैं पर 'प्रभु' ने पूरे बजट में कही भी आश्वसत नहीं किया की यात्री बर्थ पर ही यात्रा करेंगे, शौचालय और गेट के पास बैठने की नौबत नहीं आएगी। आजकल जमाना वाई-फाई वाला है, रेलवे ने भी जमाने के साथ चलने की ठान ली है।

    एक घोषणा है '5 मिनट में टिकट बुकिंग' की। जिसे रेलमंत्री ने 'अॉन बोर्ड' टिकट भी कहा। यह पहल अच्छी है, पर जुगाडू रेल में इसका एक जुगाड भी सूझा है। मान लिजीए, आप पटना से चढे हो, जबतक टीटी आपके कोच में पहुंचे , उस वक्त आपकी ट्रेन इलाहाबाद के आगे हो, आपने स्मार्ट फोन निकाला और पांच मिनट टिकट बुकिंग प्रक्रिया से टिकट बुक किया जिसमें सोर्स स्टेशन इलाहाबाद डाला गया हो,मतलब आपकी पटना से इलाहाबाद तक की यात्रा फ्री। जगीरा सारा रा रा!! वाह खिलाडी वाह!!

इसपर मेरी सहपाठिन ऋषिका ने कहा- '   अरे बकलोल, टू मिनट मैगी कभी टू मिनट में बना है?' मैने कहा- 'नहीं'।
तभी उसने कहा- 'उसी तरह ये पांच मिनट वाला भी है!! ट्रेन में नेटवर्क तो पकडता है नहीं अच्छे से ऊपर से रेलवे का साईट और टिकट बुकिंग पांच मिनट में! सर्वर गोल-गोल घूमते ही रह जाएगा। बेटिकट यात्रा मत करना वरना इस पांच मिनट के चक्कर में पांच सौ का चालान कट जाएगा।' मैं लोलवा बन गया।

      रेल बजट की मृगमिरिचिका से निकले भी नहीं थे की कायाकल्प करने वाला दूसरा बजट आ गया। जी, आम बजट। गर्मी की शुरुआत मार्च से लगभग हो ही जाती है और इस मौसम 'आम"!! जगीरा सारा रा रा!! वाह खिलाडी वाह!!

बिल्कुल आम जैसा ही है आम बजट। कॉरपरेट के लिए मालदा, मध्यवर्ग के लिए लंगडा, गरीबों के लिए गुठली। चेहरे पर फेयर एंड लवली लगाकर कल्लुआ की दोस्ती ननकी से हुई थी। कल्लुआ को डेट पर जाने के लिए पैसे उसके मित्र देते हैं। पहले ही कल्लुआ की खुशी के लिए बहुत कचकच होता है अब 1.64% का अतिरिक्त बोझ। पता नहीं कल्लुआ के लिए और कितनी कुर्बानी देनी पडेगी!! मैंने कल्लुआ से साफ कर दिया है, डेट पर जाना है तो रामलखनवा के ढाबा पर जाए, हमसे और कुर्बानी नहीं दी जाएगी।

     लेकिन,गजब है!! आदमी वोट काहे देता है? ताकि उसकी रोजमर्रा की जिंदगी सुधरे, खुशहाल रहे। कल्लुआ दमादोरदास की तरह ही कपडों का शौखीन है। बीना क्रीज के शर्ट पैंट उसे नहीं जमता है। पर धीरे धीरे,कल्लुआ का मोहभंग हो रहा है और बेचारा आम बजट के बाद तो एकदम टिकोला आम जैसे हो गया है।

     वैसे कल्लुआ जैसी हालत कईयों की हो गई है। इस आम बजट में गरीब जनता को मिलने वाली सब्सिडी में भारी कमी है। सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य से लगभग अपना बेडा छुडा ही लिया है। शिक्षा,स्वास्थ्य,गरीबों को मिलने वाली सब्सिडी सरकारी बोझ समझी जाने लगी है। इस सब्सिडी में सरकार चक्कलस खेलने लगी है। 1991 के नवउदारवाद के बाद से ही सब्सिडी की परिभाषा में अंतर आना शुरु हो गया। गरीब गुरुआ की सब्सिडी बन गई बोझ और दौलतराम की सब्सिडी बन गई उत्साहवर्धक कदम। इसको, जरा ध्यान से समझने की जरुरत है। नई सरकार का पूरा जोर 'मेक इन इंडिया' पर है इसलिए सरकारें जनहित परियोजनाओं से भी हाथ खिंच रही हैं। दरअसल, सरकारी हाथ खिंचा जाएगा,तभी तो आप 'निजी' का दामन थामेंगे। इस बजट में सबसे ज्यादा 16% की कटौती स्कूली शिक्षा से हुई है। पढाई लिखाई पर केंद्र पिछले वर्ष की तुलना में13 हजार करोड रूपये कम खर्च करेगी। स्वास्थ्य एवं जनकल्याण पर 2014-15 में 35,163 करोड रुपये आबंटित किए गए थे जिसे 2015-16 में 29,653 करोड कर दिया गया है। इसकी एक बडी वजह केद्रींय करों की राज्यों के साथ साझेदारी की नई व्यवस्था को माना जा रहा है। यह साझेदारी बडी भ्रामक है। जहाँ एक ओर केंद्र अपनी पीठ थपथपा रहा है वही दूसरी ओर बिहार जैसे राज्य का दावा है कि 14वें वित्त आयोग की सिफारिश से 50 हजार करोड का नुकसान हुआ है। मुख्यमंत्री नितीश कुमार के अनुसार 13वें वित्त आयोग से बिहार को 10.9% राशि मिलती थी, जो 14वें वित्त आयोग से 9.6% हो जाएगी। वैसे मुझे अर्थशास्त्र की ज्यादा तकनीकी तो नहीं पता पर इतना जरुर है कि अगर साझेदारी अच्छी नहीं रही तो नुकसान 'टीम' का होगा। जगीरा सा रा रा!!! वाह खिलाडी वाह!!

       कृषि क्षेत्र की जीडीपी में भागीदारी घटती जा रही है पर यह सरकार के लिए चिंतनीय विषय नहीं लगता। आज कोई भी कृषक बनना नहीं चाहता क्योंकि किसान होना मानो एक श्राप हो गया है। इस पेशे में न तो लाभ है न ही इज्जत। भूमि अधिग्रहण जैसे बिल तो किसान को जीते-जी मारने के तरकीब हैं। पिछले एक वर्ष में किसानों की आत्महत्या में 26% वृद्धि दर्ज की गई है। यह टीवी और अखबारों का प्रमुख मुद्दा होना चाहिए था पर शायद अब ये खबरें टीआरपी नहीं दिला सकती हैं। जगीरा सारा रा रा रा!! वाह खिलाडी वाह!!

      नई सरकार के कदम बेहद निर्मम है जिसे वित्त मंत्री 'कडवी गोली' का नाम देकर साहसी होने का पीठ थपथपवातें हैं। यह कडवी गोली तो है जरुर पर इससे तबीयत सुधरने के बजाय और बिगडने वाली है। किसी भी सरकार के आय का स्त्रोत राजस्व होता है जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष कर के रुप में जनता से वसूला जाता है। प्रत्यक्ष कर देने वाले इस देश में बहुत थोडे से लोग है पर अप्रत्यक्ष कर तो रिक्शेवाले से लेकर अंबानी तक देता है। सरकार ने कॉर्पोरेट टैक्स में पांच फिसदी कटौती की है और इसकी भरपाई के लिए एक करोड अथवा उससे अधिक आय अर्जित करने वाले सुपर रिच वर्ग से दो फीसद अधिभार (सरचार्ज) वसूल कर तकरीबन 9000 करोड रुपये का लक्ष्य बनाया है। अब यह तो अर्थशास्त्र को ही तय करना होगा कि क्या पांच फिसदी की टैक्स छूट दो फीसदी सरचार्ज के बराबर होता है या नहीं। कार्परेट टैक्स में कटौती से दीर्घकालिक तौर पर उद्योग जगत को लाभ होगा, लेकिन सवाल यही है कि उद्योग जगत इस धन का निवेश कहां और किस काम में करता है।  जगीरा सारा रा रा रा!!! वाह खिलाडी वाह!!

   बजट के ऐनैक्सचर पर दरअसल ज्यादा माथापच्ची नहीं की जाती है। या तो इसे सरकार की विफलता कह लिजिए या उत्साहवर्धक चूर्ण के रूप में देख लिजीए, पर पहली वाली उपाधी ज्यादा उपयुक्त रहेगी। जी, हर बजट में रेवेन्यू फ़ोरेगोन (foregone) का जिक्र ऐनैकस्चर में ही होता है। दरअसल, इसे कहते हैं फ़ोरेगोन (foregone)  पर ये है forgone. कोरप्रेट कर्ज माफी की सीमा अब 5,72,923 करोड पहुंच गई है जिसे हम रेवेन्यू फोरगोन कहते हैं। ऐनैक्सचर हालांकि बजट में 2005-06 से ही जोडा गया है और हर वर्ष इसमें वृद्धि हो रही है। विगत नौ वर्षों में ये कर्ज माफी 36.5 ट्रिलीयन पहुंच गई है। अगर इस पैसे पर हिसाब बिठाया जाए तो इसमें मनरेगा जैसी योजना को अगले 105 वर्षों तक चलाया जा सकता है। (मनरेगा के लिए 34,000 करोड का आबंटन है) पीडीएस (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) को अगले 31 वर्षों तक चलाया जा सकता है (पीडीएस का कुल आबंटन 1,15,000 करोड है)। ये कर्ज माफी की मलाई चखने वाला वर्ग सरकारी बैंकों को हजारों करोड रुपयों का चपट लगा चुका है। दुखद है कि ये कभी बहस के मुद्दे नहीं बनते पर बिजली पानी  पर दी गई मामूली सब्सिडी सबका ध्यान आकर्षित करती है। जगीरा सारा रा रा रा!!! वाह खिलाडी वाह!!

        इस बजट में गरीबों के लिए कुछ भी खास नहीं है, मध्यम वर्ग जस का तस है सिर्फ उच्च वर्ग को ही इस का फायदा मिला है। एक तरफ कर्ज माफी दूसरी ओर टैक्स छूट। जहाँ कार्पेरेट छूट से 8,000 करोड का नुकसान है वही अप्रत्यक्ष कर बढाकर 23,000 करोड बनाने का प्रावधान है। मध्यम वर्ग जो कि सबसे लालची और खपाऊ वर्ग है, जिसे खुद को सबसा बडा उपभोक्ता कहलाने में शान महसूस होता है ,सबसे बडा बोझ उसपर पडने वाला है। सिर्फ जूते छोडकर कोई भी उत्पाद सस्ता नहीं हुआ। शायद जूतों की माला इस वर्ग को पहना दी गई है जिसे दिलदार मध्यम वर्ग ने शान से गले का हार भी बना लिया है। जगीरा सारा रा रा रा!! वाह खिलाडी वाह!!

       पिछले 2013-14 के प्रस्तावित बजट में 5.75 लाख करोड जनहित योजनाओं पर खर्चने की योजना थी पर सरकार सिर्फ़ 4.67 लाख करोड ही खर्च पाई। अब इस वित्तीय वर्ष में इसकी और छटनी कर सिर्फ 4.65 लाख करोड आबंटित किए गए हैं। अब धीरे धीरे आम लोग 'मिनीमम गवर्नेंस,मैक्सिमम गवर्नमेंट' समझने लगे हैं। बोलिए, जगीरा सारा रा रा!!! वाह खिलाडी वाह!!!

         शिक्षा स्वास्थ्य से सरकारी राशी कम की जा रही है और लोगों में प्राइवेट के प्रति स्नेह पैदा की जा रही है। कई लोग प्राइवेट को गुणवत्तामक मानते हैं, कहते पाएं जाते हैं-'पैसा ज्यादा ले लो,पर क्वालिटी हो।' और इसी को भंजाने में सरकार भी लगी है। सरकार को जहाँ सरकारी शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता सुधारने की ओर दृढ़ संक्ल्पित होना चाहिए था वो खुद प्राइवेट गुणगान में लीन है। इस रवैये से हम सरकार और लोकतंत्र की परिभाषा में अमूल परिवर्तन का दौर शुरु होता देख रहें हैं। विकास का मतलब सिर्फ आंकडेबाजी नहीं होना चाहिए। केंद्रीय सांख्यिकी विभाग ने बेस इयर में बदलाव किया और ग्रोथ रेट 7.4% हो गया। शायद अब इस ग्रोथ रेट वाले दौर का गांधी तलिस्म से कोई नाता नहीं हैं। उस दौर का लगभग स्वर्गवास हो चुका है जिसमें हास्ये पर खडे व्यक्ति की चिंता होती थी।

       मेरे पाठक,जो भी इस लेख को पढ रहें हैं, उनसे जरा बजट पढने-समझने के वक्त बजट सत्र और उसमें भी रेल-आम बजट की घोषणा के दिन को महीने के प्ररिपेक्ष्य में देंखे, दुख कम होगा। दरअसल,ये महीना फगुआ (फाल्गुन) का है, होली के पर्व का पावन महीना, इस महीने लोग थोडे बहक जाते हैं, दुश्मन भी दोस्त बन जाते हैं। गरीबों और मध्यवर्ग को बजट यही समझा रहा है। क्या हुआ जो कुछ नहीं मिला, बुरा ना मानो होली है!! बोल जगीरा सारा रा रा रा!!!
   
-रोहिण कुमार
दिल्ली विश्वविद्यालय

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