बाजार की संस्कृति : मोबाइल पर सिकुडता मार्केट

बाजार की संस्कृति : मोबाइल पर सिकुडता मार्केट

अॉफर किसे बुरे लगते हैं, कौन नहीं लाभ लेना  चाहता आखिर हमारे लिए ही तो हैं! ग्रोसरी, ड्रैसेस, होम एप्लाइंसेस, अॉटोमोबील, इलेक्ट्रॉनिक्स, स्टेशनरी सब उंगलियों से स्क्रीन के स्पर्श भर दूर. माने, मार्केट मोबाइल पर, हम मोबाइल पर. दुकान दर दुकान कोई माथापच्ची नहीं।

उपभोक्ता के दृष्टिकोण से ये तमाम अॉफर बहुत सुनहरे लगते हैं. व्यापार वही अच्छा भी कहलाता है जो अपने उपभोक्ताओं के लिए सुगम और सुखद अवसर पैदा करे पर, इस अॉनलाइन मार्केटिंग की दुनिया के महिमामंडन में छोटे व्यपारियों को बेचारा और बेबस सा बना दिया है।

इ-कॉमर्स जरुर डिजिटल इंडिया, विकास का सूचक हो पर उस विकास में छोटे व्यापारियों की भी तो फ्रीक करनी होगी. आखिर, वो भी तो उसी सवा सौ करोड भारतीयों का हिस्सा हैं. प्रधानसेवक ने कारोबारियों के साथ बैठक में कहा था- "व्यापारी सैनिकों से भी ज्यादा जोखिम उठाते हैं।" व्यापारी जब इतने महत्त्वपूर्ण हैं तो उनके हीतों की रक्षा भी तो करनी होगी.

नेहरू प्लेस पर साईंबा कंप्यूटर के मालिक नरेंद्र सिंह कहते हैं कि वो पंद्रह-बीस पीस माल खरीदते हैं, उसी हिसाब से रेट लगाते हैं पर, यह रेट अॉनलाइन मिल रहे कंप्यूटर से ज्यादा ही होता है क्योंकि अॉनलाइन कंपनियाँ सीधे सैकडों माल कंप्यूटर बनाने वाली कंपनी से ही ले लेते हैं तो ग्राहकों को ज्यादा डिस्काउंट देने के बावजूद मुनाफा कमाते हैं पर छोटे दुकानदार इस बाजार में धीरे-धीरे हारते दिख रहे हैं.

सब्जियों का अॉनलाइन सेल कितनों गरीब छोटे दुकानदारों की जिंदगी पर भारी पड रहा है  इसका इल्म हमें सिर्फ उपभोक्ता बन सोचने से नहीं होगा, थोडा इंसान बनकर तो सोचना ही होगा. इ-कॉमर्स का बिजनेस भारत में जैसे फूल-फल रहा है यह सामाजिक विषमता की एक नई इबादत लिखने को आमादा है. जब तक देश में इ-कॉमर्स पर सख्त कानून या नियंत्रण नहीं लगाया गया, थोडा नैतिक उपभोक्ता बनें.

वैसे, उपभोक्ता नैतिक भी हो सकेगा, इसपर मुझे खुद संदेह है पर फिर भी, इंसान तो पहले हैं न. खुद फुर्सत में दिमाग पर बल डालिए, क्या कहाँ से कितना खरीदना है. बार्गेन का स्पेस तो रहना ही चाहिए, वो तो वर्चुयल मार्केट में नहीं मिलेगा.

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