आबरु की आड में बीमार होता शरीर:: ब्रेस्ट सिर्फ कामुकता जागृति नहीं स्वास्थ्य का भी विषय है
है तो शरीर का अंग ही पर शरीर में होते हुए भी शरीर से जुदा. दूसरों की नजरों का आकर्षण खुद की आँखों से महरुम. घातक बीमारी की दस्तक के बावजूद विमर्श का माहौल तैयार कर पाना बेहद मुश्किल.
बेहद खूबसूरत अंग जिसे केंद्रबिंदु में रखकर ना जाने कितने कलाकारों ने सदियों से मातृत्व, मोहब्बत उकेरा, पर अब फिल्मी सीन, ऐड में इसे ऐसे पेश किया गया/जा रहा है जैसे ये कोई अंग नहीं, संभोग के प्रति आकर्षित करना ही एकमात्र उद्देश्य रहा, सिर्फ कामुकता जागृति का अंग बनकर रहा. ब्रेस्ट निजी शरीर का सामाजिक अंग बनता चला गया.
घटते समय के साथ हालात ऐसे हो गए कि बृहंमुंबई महानगरपालिका ने लिंगरी मैंक्यून (पुतला मॉडल) को रेप की बढती घटनाओं का कारण मानते हुए बैन कर दिया. पुतलों को पुतला न समझ सके तो ब्रा को महज एक कपडा समझ सकेंगें, संदेह है.
ब्रा पहनना ना पहनना बाकि अन्य कपड़ों की ही तरह बिल्कुल व्यक्तिगत फैसला है, होना चाहिए. अमूमन, ख्याल से इसके पहनने और पहनवाने के तीन तर्क हैं-
१. बिना ब्रा के कमीज पर निप्लस उभर कर आएंगें, बेहूदापन....!
२. ब्रा ब्रेस्ट को प्रोपर शेप देता है (बिल्कुल वैसे ही जैसे पेनीस के प्रॉपर साइज के लिए चड्डी पहनना जरुरी)
३. बिना ब्रा के चलने/दौडने पर ब्रेस्ट बाउंस करते हैं जो कि उसकी प्राकृतिक बनावट की वजह है पर, असभ्यता, बेहूदेपन में श्रेणीबद्ध..
आलम ऐसा की कमीज में दिखती ब्रा की पट्टी, गले से गुजरती स्ट्राइप स्कूली दिनों से ही ब्यॉय्ज और गर्ल्स गॉशिप का हिस्सा बनी क्योंकि घर से ही हमें ब्रा को कपडे के रूप में नहीं बताया, समझाया गया. गॉशिप में ब्रा/ब्रेस्ट हंसी-ठिठोली, मजे का विषय बना, कभी शरीर के अंग को वो विमर्श का स्पेस ही नहीं मिल पाया जहाँ उसे सिर्फ अंग समझा जाए. शरीर में हो रहे और भी शारिरीक बदलाव (जैसे- पेनिस का इरेक्शन, माहवारी, गुप्तांगों/काँख पर बाल आना इत्यादि) का तो जिक्र भी गुनाह सा रहा. ना तो कोई बताने वाला, माँ-बाप भी नहीं. ये कुछ ऐसे मुद्दे माने लिए गए/जाते हैं, बच्चे खुद समय के सीखेंगें/जानेंगें. चुंकि, हमारे पूवर्जों ने भी इसपर खुलकर कभी चर्चा नहीं कि तो ये सभ्य ट्रेंड सेट हुआ.
क्या अब यह सभ्य ट्रेंड थोडा असभ्य होगा, अगर इसे सभ्य-असभ्य में ही बांटना है तो. Sydney Ross Singer और Soma Grismaijer ने अपने शोध "Dressed to Kill: The Link Between Breast Cancer and Bras" के आधार पर ब्रेस्ट कैंसर का एक मुख्य कारण ब्रा को माना है. गूगल पर आसानी से उपल्बध है. इसी शोध के आधार पर दुनियाभर में International No Bra Day मना गया, हालांकि कईयों ने इस शोध को खारिज भी किया. पर बडा सवाल है कि क्या हमारा समाज इसपर विमर्श की गुजांईश करेगा या एक घातक रोग गुप्तरोग की श्रेणी में डाल पब्लिक स्पेस से बाहर कर दिया जाएगा?
शोध के मुताबिक, ब्रा की वायरिंग lymphatic circulation में बाधा पहुंचाती है और शोध के अनुसार toxins वक्षों में जमा होते चले जाते हैं. भारत के संदर्भ में देखे तो यह गंभीर विषय कितनी गंभीरता से कब उठेगा, पता नहीं. एड्स जागरुकता के तमाम प्रयासों के बावजूद कंडोम टैब्बू बना ही है, ब्रेस्ट कैंसर पर तो चर्चा शुरु भी नहीं हुई है.
वैसे, नो ब्रा जैसे प्रतिकात्मक कारवाई के प्रति भारत संवेदनशील बचा भी नहीं, भले ही उद्देश्य जागरुकता हो. साहित्यकारों का सम्मान लौटाना तक राजनीति से प्रेरित हो जाए, किस अॉफ लव भारतीय संस्कृति के खिलाफ, वेलंनटाइन डे पर पार्कों में रणवीर/बजरंग सेना का ताडंव....ऐसे में नो ब्रा जैसे कैंपन शुरुआत के पहले ही पैक हो जाती है. भारत में हर वर्ष करीब एक लाख तीस हजार (1,30,000) ब्रेस्ट कैंसर के केस आ रहे हैं जिसमें ज्यादातर महिलायें पचास(50) से कम उम्र की हैं. WHO के अनुसार भारत को 2030 तक बीस अरब डॉलर प्रति वर्ष ब्रेस्ट कैंसर पर खर्चने होंगें. समझने की जरुरत है, हर बीतते वर्ष स्वास्थ्य बजट घट रहा है तो इसके इलाज में भी प्राइवेट प्लेयर्स के लिए खुला मैदान है. शरीर पर आर्थिक मार भी पडेगी.
इसके पहले की समस्या का दैत्यीकरण हो, व्यक्तिगत तौर पर ही सही विमर्श तो शुरु किजीए. काश, सोशल मीडिया पर इस ब्लॉग को एक लडकी लिखती और उसे मुकम्मल महफूजित का इल्म यह पब्लिक स्पेस करवाता. पिंजरा तोडने का वक्त.
जरुरी लिंक-
http://www.nationalbreastcancer.org/breast-cancer-facts
http://www.killerculture.com/shop/dressed-to-kill/#.Vh-DZHq6Ywg
http://www.marieclaire.com/culture/a15317/i-stopped-wearing-a-bra/
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