क्या अब हमें दक्षिणपंथी चरमपंथ के साथ वामपंथी चरमपंथ भी झेलना होगा?

क्या अब हमें दक्षिणपंथी चरमपंथ के साथ वामपंथी चरमपंथ भी झेलना होगा?

डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स यूनियन का ये वही पैम्फलेट हैं जिसपर इतना अखाड़ा लगा. डीएसयू ने शुरुआत में लिखा कि अफ़जल गुरू की फाँसी भारतीय राज्य द्वारा की गई हत्या  है. ये हत्या एक लोकतांत्रिक राज्य ने नहीं बल्कि ईर्ष्यापूण व बदले की भावना से की गई. राज्य ने जनता की सामूहिक चेतना जागृत  (collective conscience) कर फाँसी को वैध साबित करने की कोशिश की और आव़ाम को इस सज़ा का जिम्मेदार बनाया. फाँसी के पहले अफ़जल के परिजनों व वकील तक को इसकी सूचना नहीं दी गई.

दूसरे पारा में डीएसयू लिखती है कि करीब एक दशक बाद भी अफ़जल की फाँसी को लोग भूलें नहीं हैं. अफ़जल पर झूठे केस लादे गये,  उसे टार्च़र किया गया और अंत में उसे फाँसी दे दी गई. उसकी छवि मासूम काशमीरी व्यक्ति से एक आंतकवादी में तबदील कर दी गई.

फाँसी काशमीर की आजादी को चल रहे संघर्ष को कमजोर करने का प्रयास था लेकिन राज्य भूल गया उसके इस सज़ा से काशमीरी युवाओं का संघर्ष और भी ज्यादा मजबूत होगा. आज अफ़जल ना सिर्फ़ शहीद है बल्कि काशमीरियों के साथ भारतीय राज्य द्वारा किए गए ऐतिहासिक अन्याय का प्रतिक है.

यहाँ से डीएसयू काशमीर और पूर्वोत्तर में लगे अफ्सपा (AFSPA) कानून के अंतर्गत हो रहे लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन की बात करती है. आगे, काशमीर की आज़ादी का संघर्ष सिर्फ़ अपनी जमीन का संघर्ष नहीं लेकिन हर काशमीरी के आत्मसम्मान का विषय है. आफ्सपा कानून के युवाओं पर जुल्म और महिलाओं के बालात्कारी सेना के वर्दी में हैं.

अफ़जल हमारे बीच नहीं है लेकिन उसकी शहादत काशमीरियों के बीच जिंदा है. आज़ादी का अधिकार और काशमीर का भारत से अलगाव हर काशमीरी का मौलिक अधिकार है. और अंत में डीएसयू लोगों से काशमीर की आज़ादी की माँग के साथ खड़े होने की अपील करती है.

सवाल:-
स्पष्ट है डीएसयू बाकि कईयों की तरह सज़ा-ए-मौत व काशमीर और पूर्वोत्तर राज्यों में आफ़्सपा का विरोध करती है लेकिन आपने अफ़जल को शहीद कैसे घोषित कर दिया? काशमीरियों को भारत के साथ रहना है या पाकिस्तान के साथ या आज़ाद होना है इतिहास के मुताबिक होना तो चाहिए इस बात पर जनमत संग्रह लेकिन डीएसयू अपना निर्णय  क्यों थोपना चाहती है? क्या आपने जनमत संग्रह करवा लिया है? किस आधार पर आप आज़ादी का समर्थन कर रहे हैं?

जेएनयू एक अकादमिक संस्था है वहाँ से हम उम्मीद करते हैं खासकर इस पूरे प्रकरण पर कि कैपिटल पनिसमेंट जैसे औपनिवेशिक कानून को निरस्त किये जाने का संघर्ष तेज किया जाए ना कि आंतकवादियों को शहीद घोषित कर राष्ट्र के खिलाफ़ नारेबाजी हो, इससे आपका संघर्ष कमजोर होता है. जिस तरह से आप काशमीर की आजादी का निर्णय थोप रहे हैं ठीक उसी तरह दक्षिणपंथी खुद ही अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का निर्णय थोपते हैं.
क्या अब हमें दक्षिणपंथी चरमपंथ के साथ वामपंथी चरमपंथ भी झेलना होगा?

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