आखिर, हम समाज को क्या देने जा रहें हैं?

सोशल साइंस- मीडिया वैगेरह के छात्र होने का क्या लाभ जब भावनाएं तर्कों के ऊपर चढ़ बैठी हों? आखिर, हम समाज को क्या देने जा रहें हैं!

कुछ दिनों में जेएनयू-जाट सब टीवी से उतर जाना हैं लेकिन सबसे बड़ा नुकसान इस बीच उस क्लास का होना है जिसे आगे चल मीडिया, सीविल सर्विस, अकादमिक क्षेत्र में अपना करियर बनाना है. ऐसा कहना इसलिए जरूरी है क्योंकि शायद ही किसी ने बड़े प्रश्न रेखांकित करने की कोशिशें की हैं-

क्या हमने नारों के परिपेक्ष्य को समझने की कोशिश की? क्या कश्मीर मसला, अफ्सपा कानून बार-बार विमर्श नहीं खोजता? सजा-ए-मौत, देशद्रोह जैसे कानूनों पर चर्चा नहीं होनी चाहिए? क्या हम मिल के सिद्धांतों से होते अभिव्यक्ति की आजादी वैगेरह पर बात नहीं कर सकते? राष्ट्रवाद माना है लेकिन क्या हम टैगोर के राष्ट्रवाद पर आलोचना नहीं पढ़ सकते?

मैं ये सिर्फ़ आपके लिए नहीं बल्कि अपने लिए भी कर रहा हूँ. विश्वविद्यालय और ऊपर से सोशल साइंस के छात्रों ने भी विमर्श-तर्क़ छोड़कर भावनाओं को तर्क़ का आधार बनाना शुरू कर दिया है. भावनाएं बुरी नहीं होतीं लेकिन धारा के विपरीत और चौतरफा देखना-समझना-परखना भी तो हमारी ही जिम्मेदारी हैं.

क्या हर विषय को अपने तरफ से ये सारे मसले नहीं देखने चाहिए? क्या अंग्रेज़ी, हिंदी, इतिहास, राजनीति शास्त्र आदि को अपने-अपने डिस्कॉर्स से तर्क़ फ्रेम नहीं करने चाहिए? गर हमारी पढ़ाई-लिखाई हमारे अंदर ये अलख जगाने में नाकामयाब हो रही हैं तो हमें और हमारी शिक्षा प्रणाली शक़ की निगाहों से देखी जानी चाहिए.

सोशल साइंस पहले ही आज के टेक्नोलॉजिकल युग में संघर्षरत है, गर हमने भी अपने सब्जेट के साथ न्याय नहीं किया तो शायद हमें दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू वैगेरह के डिग्री चमकाने का कोई हक नहीं है. हमें सोचना चाहिए. आखिर, विषय के साथ ईमानदार न रहें तो ये भी राष्ट्र निर्माण में अड़चन ही है! आखिर हम बाहर समाज को क्या देने जा रहें हैं, ये हमें सोचना चाहिए.

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