मिडीया मंथन

दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र में पत्रकारों की संदेहास्पद मौत एक गंभीर चिंता का विषय है। हैरत की बाद यह की इसके बावजूद पत्रकारिता जगत में कोई खास बेचैनी नहीं दिखती। इसकी सबसे बडी वजह कॉरपोरेट मिडीया का दैत्यीकरण होना है।

ताजा घटना व्यापम घोटले की स्टोरी पर काम कर रहे आजतक के पत्रकार अक्षय सिंह की मृत्यु की है। इलेक्ट्रॉनिक मिडीया का बडा नाम 'आजतक' दिनभर हजारों बार खुद को 'देश का नंबर वन चैनल' बताता फिरता है पर जब खुद अपने पत्रकार की हत्या की बात आती है तो अपने एनिमेशन ऐड की तरह 'सो सॉरी' मोड में कुंडली मार बैठा दिख रहा है।

कॉरपोरेट मिडीया के आगमन ने पत्रकार को महज एक कर्मचारी की श्रेणी में तबदील कर दिया है। जहाँ एक तरफ मिडीया के आकर्षण यों कहें गलैमर की वजह से युवाओं की भीड इस क्षेत्र में करियर बनाने को दौड रही है,हजारों मिडीया संस्थान छात्रों के सपनों को 'कैश' कर रहे हैं वहीं पत्रकारिता के मूल तत्व लगातार धाराशायी होते जा रहे हैं।

कॉरपोरेट पूंजी के सामने आज चैनल और पत्रकार मजबूर तो हैं ही साथ ही सरकारी घूंघट पहनाने की भी ताबाडतोड कोशिशें जारी हैं। योग दिवस के दिन राज्यसभा टीवी पर योग दिवस के प्रसारण को उठे बेजा सवाल इसकी भनक दे रहें हैं। निजी चैनल तो मसाला खबरों से लेकर किसी खास नेता के महिमामंडन के लिए मशहूर है हीं। पर इन सबके बीच पत्रकारिता जगत के वरिष्ठों को पत्रकारिता गुण (सत्यता,तथ्यात्मकता,निर्भीकता आदी) की रक्षा करने के लिए ठोष कदम उठाने होंगे अन्यथा यह स्थिती आपातकाल का नया संस्करण लिख सकती है।

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